पूंजीवाद युग में मजदूरों के दुस्साहस को सलाम



                  (फोटो साभार अमर उजाला )

नोएडा की तपति दोपहरी में भूखे पेट मजदूर हफ्ते भर 'उग्र' हड़ताल पर थे .यह हड़ताल शायद होता भी नहीं अगर खाड़ी देशों में युद्ध न हो रहा होता और सिलिंडर की दिक्कत न आती.लेकिन अब मजदूरों की अतड़िया 'भयंकर' महंगाई की मार से सूखने लगी हैं. समस्या अब उनके चूल्हे तक पहुँच चुकी हैं इसलिए उनका साहस जवाब दें चुका हैं कि अब बस.
इनका हड़ताल चार दिन में 300 से ज्यादा फैक्ट्रियों में ताला लगवा चुका हैं. पचास हजार से ज्यादा मजदूर सड़कों पर थे . जलती दोपहरी में ये पुलिस की लाठियाँ खा रहें थे पर चार दिनों से इन्होंने क्या खाया हैं सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.
जिस सरकार ने कोरोना काल की दफ़न लाशों को भी कभी स्वीकार नहीं किया. उसने कभी यह भी स्वीकार नहीं किया की लोगों की मौत ऑक्सीजन की वजह से हुई थी भला वह सिलिंडर की किल्लत कैसे स्वीकार करती वह भी तब जब देश के 5 प्रमुख राज्यों में चुनाव चल रहा हैं.
ये मजदूर प्रमुख तौर पर उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश जैसे हिंदी पट्टी के लोग ही हैं. यहाँ किसकी सरकार हैं यह भी आप अच्छी तरह जान रहें हैं. ये लोग इस शहर में किराए के घरों में रहते हैं जहां एक आठ बाई आठ कमरे का किराया पांच से छः हजार रूपये होता हैं. जाहिर हैं इनका किराया कोई एक मजदूर नहीं दें सकता इसलिए इनमें चार पांच मजदूर एक साथ रहते हैं.ईधर जब से खाड़ी देशों में युद्ध आरम्भ हुआ हैं इनको एक सिलिंडर तीन से चार हजार में मिल रहा हैं (ब्लैक में क्योँकि इनका कोई स्थायी पता नहीं होता ) अब पंद्रह हजार कमाने वाला भला यह खर्च कहां तक उठा सकता हैं?


ऐसे में भी इन मजदूरों की मांग क्या हैं सिर्फ थोड़ी सी तनख्वाह वृद्धि! ये मजदूर आज भी अपने हाड़तोड़ मेहनत के बदले सिर्फ बीस हजार ही तों मांग रहें हैं. क्या चौथे अर्थव्यवस्था वाली सरकार अपने मजदूरों को यह भी नहीं दें सकती(माफ़ी चाहूंगा अब हमारा देश विश्व के पाँचवी अर्थव्यवस्था की सूची से बाहर हो चुका हैं)वैसे बता दें की अमेरिका के मजदूरों की तनख्वाह हमसे दस गुना ज्यादा हैं जर्मनी की बीस गुना और हमारा पडोसी चीन भी हमसे दो गुना अपने मजदूरों को तनख्वाह देता हैं जिस पर हमारे देश के लोग सस्ती मजदूरी देने का आरोप लगाते रहते हैं. अब रही बात आज बीस हजार तनख्वाह की तों क्या कीमत हैं इस बीस हजार की नोएडा जैसे महंगे शहर में. आपको बता दूं एक मजदूर इतनी तनख्वाह में  अपने परिवार के साथ यहाँ कभी गुजारा नहीं कर सकता. वें अपनी आत्मा से यह समझौता कर चुके हैं कि वह अपने बच्चों, पत्नि के साथ नहीं रह सकते फ़िर भी उन्हें सरकार से कोई शिकायत नही हैं.
शिकायत से बताना चाहूंगा की हाल ही में उत्तरप्रदेश सरकार ने एक दशक से स्कूलों में कार्यरत अनुदेशकों की तनख्वाह सात हजार से सत्रह हजार कर दी हैं जिससे इन शिक्षकों में ख़ुशी की लहर हैं. प्रदेश सरकार अपने डिग्री कालेजों में अतिथि शिक्षकों तथा संविदा कर्मियों को भी साल के दस महीने पच्चीस हजार पर आसानी से काम करवा रही हैं. और ये पढ़े लिखें लोग सरकार को कोसते हुए अकेले अकेले संघर्ष कर रहें हैं. ऐसे ही सरकार देश भर में पढ़े लिखें लोगों से संविदा के नाम पर सालों से काम निकालती आ रही हैं पर इन पढ़े लिखें लोगों की क्या मजाल जो सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल सके क्योँकि नियुक्ति से पहले ही इनसे सहमति पत्र दस्तखत करवा लिया जाता हैं. जिसे ये कानूनी प्रक्रिया कहते हैं. दरअसल यह कानूनी प्रक्रिया नहीं बल्कि पूंजीवाद का एक घिनौना रूप हैं.

इस पूँजीपति दौर में जब देश का 90%सम्पत्ति पर दस प्रतिशत लोगों का नियंत्रण हैं फ़िर भी ऐसे ताक़तवर लोगों से कैसे लड़ रहें हैं ये मजदूर यह अपने आप में किसी क्रांति से कम नहीं हैं. हो सकता हैं कल ये हड़ताल ख़त्म होने के बाद ये कम्पनियाँ इन 'बागी' मजदूरों को काम पर न रखें. क्योँकि जब सरकार बागियों को नहीं बर्दाश्त कर पा रही हैं तों ये पूँजीपति लोग इन्हें कहां बर्दाश्त करने वाले हैं.
ईधर एक दशक से इस सरकार को देश में चारों तरफ हड़तालें, विरोध, दंगे देखने को मिले हैं जिनमें किसान आंदोलन, विद्यार्थी आंदोलन, बेरोजगार आंदोलन, वोट चोरी आंदोलन, दलित आंदोलन, आदिवासी आंदोलन, नागरिक सुरक्षा आंदोलन, आस्था आंदोलन जैसे अनगिनत आंदोलन शामिल हैं बस इसी आंदोलन की कमी थी सो वो भी देखने को मिल गया.श्रम मंत्रालय न्यूनतम मजदूरी की गारंटी देती हैं पर उसकी सच्चाई किसी से छुपी नहीं हैं. ग्रामीण खेतिहार मजदूरी आज भी सौ रूपये से कम हैं.सरकारी विद्यालयों में मध्यान भोजन बनाने वाली महिलाओं को स्वयं सरकार दो हजार भुगतान करती हैं. नरेगा जिसे अब जी राम जी कर दिया गया हैं उसकी न्यूनतम मजदूरी दो से ढाई सौ के बीच स्वयं सरकार द्वारा तय की गईं हैं.
दरअसल आज हमारी पूरी व्यवस्था पूंजीपतियों के गिरफ्त में हैं. यही कारण हैं की दस साल में कोई व्यापारी अपनी सम्पत्ति हजार से अरब तक कर लें रहा हैं और एक मिडिल क्लास तथा गरीब व्यक्ति इस दस साल में एक घर तक नहीं बना पा रहा. खैर मजदूरों की यह क्रांति क्या रंग लाएगी इस पूंजीवादी व्यवस्था में यह हम सबको पता हैं परन्तु इन कम पढ़े लिखें लोगों ने अपनी तमाम मजबूरियों के बाद भी सरकार से जिस प्रकार सवाल किया हैं इसके लिए हमें इन्हें सलाम करना चाहिए.


Post a Comment

Previous Post Next Post