क्या नज़ीर की मॉब लिंचिंग बन पाएगी "नजीर"


       (फोटो सोशल मीडिया साभार )
इस 14 जून को मॉब लिंचिंग के इतिहास में पहली मध्य प्रदेश के सिवनी मालवा के जिला न्यायालय द्वारा एक साथ 14 दोषियों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई है । मुकदमे का निर्णय न्यायाधीश तबस्सुम खान के द्वारा सुनाया गया है । चूंकि मामला हिंदू मुस्लिम पक्ष से जुड़ा है और निर्णय एक मुस्लिम महिला द्वारा सुनाया गया है जिसका तथाकथित गौरक्षक समाज सोशल मीडिया तथा अन्य तरीकों से विरोध कर रहा है वहीं संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करने वाले लोगों ने इस निर्णय का स्वागत किया है ।
बात 3 अगस्त 2022 की हैं। नज़ीर अहमद अपने दो साथियों के साथ महाराष्ट्र से अपने ट्रक में 25 से 30 गाय और बछड़े लेकर उन्हें बाजार में बेचने(व्यवसायिक )के लिए निकले थे। मध्य प्रदेश के नर्मदा पुरम में रात्रि लगभग दो से तीन बजे तथाकथित गौरक्षक उनके ट्रक को घेर कर रोक लेते हैं और संदेह की बुनियाद पर तीनों को पीटने लगते हैं तथा उन्हें जोर-जोर से धार्मिक नारे लगाने के लिए कहते हैं और खुद ही इसका वीडियो भी बनाते हैं और समाज में इसका प्रचार प्रसार भी करते हैं। दर्जनों लोगों द्वारा हिंसक मारपीट की वजह से अंततः 55 वर्षीय नजीर की कुछ दिनों बाद अस्पताल में मृत्यु हो जाती है। अब लगभग चार वर्ष पश्चात् इसका निर्णय आता है जिसकी चारों तरफ चर्चा हो रही है ।
        सभी 14 अपराधी बहुत ही सामान्य परिवार से है। यह सभी हिंदू राष्ट्र और गौ रक्षा के नाम पर अंततः अपना जीवन तो बर्बाद कर ही चुके हैं उसके साथ-साथ अपने परिवार का भी जीवन बर्बाद कर रहे हैं। यह समाज के ऐसे नवयुवकों में से हैं जो तर्क का विवेक खो चुके हैं। इनके पास ना ही कोई अच्छी शिक्षा है और ना ही इतनी संपत्ति जिसके दम पर यह अच्छा जीवन जी सके। कमोवेश हिंदू राष्ट्र और गौ रक्षा के नाम पर जितने भी नवयुवक इस तरह का अपराध कर चुके हैं या कर रहे हैं यह सभी साधारण परिवार से और तथाकथित उच्च जातियों द्वारा ही बरगलाए गए हैं। पिछले एक दशक से मॉब लिंचिंग के मामलों ने देश और दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। इसके पहले ऐसे शब्दों का पहले कभी प्रयोग नहीं था। ऐसा नहीं था कि इससे पहले भारत में कोई अपराध नहीं होते थे या फिर इस तरह की हत्याएं नहीं होती थी। देश में इन घटनाओं से पहले भी बड़े-बड़े अपराध और सामूहिक हत्याएं हुई है। बेलछी कांड, हासिमपुर हत्याकांड, लक्ष्मणपुर बाथे हत्याकांड, खैरलांजी हत्याकांड जैसे बड़े-बड़े सामूहिक नरसंहार हुए हैं पर लिंचिंग का मामला इनसे अलग है। क्योंकि पूर्व में हुए सब अपराध जाति और मजहब की दुर्भावना से होते थे पर अब "गाय रक्षा"के नाम पर होने वाले इस जातीय तथा धार्मिक विद्वेष से किए गए इस अपराध ने समाज में एक नई भाषा को जन्म दिया है जिसे आज हम मॉब लिंचिंग कहते हैं। यानी अंधी भीड़ द्वारा बेवजह किसी की निर्मम हत्या।
 पिछले एक दशक में गौ रक्षा के नाम पर इतने जघन्य अपराध हुए हैं जिनके वीडियो और फोटो देखकर हमारे कलेजे दहल जाते है । मन में यही सवाल होता है कि आखिर यह लोग कौन हैं, क्या उनके परिवार और समाज ने इन्हे खुला छूट दे रखा हैं ऐसा अपराध करने के लिए? और अपराध भी ऐसा कि खुद अपराधी मजे से हिंसा करते हैं और उसका वीडियो भी वायरल करते हैं। इन लोगों के लिए कानून जैसे मजाक बन चुका हैं। ऐसा इसलिए है कि इन अपराधों के बाद यह लोग कुछ ही महीनो में बरी हो जाते है और तथाकथित इनके गौरक्षक समाज द्वारा इनका फूल माला से स्वागत किया जाता है । दरअसल गौ रक्षा अथवा गौ सेवा जैसा इनका कोई कृत्य नहीं होता। इनके आकाओं को मुसलमानों और दलितों के नाम पर भड़काने तथा लड़ाने के लिए एक हथियार चाहिए। जिसके लिए यह कभी गाय तो कभी गंगा का इस्तेमाल कर रहे हैं। अगर गाय की यह सचमुच सेवा करना चाहते हैं या उसकी रक्षा करने का इन्होंने बिड़ा उठाया है तो पिछले 10 सालों का आंकड़ा उठा कर देख ले जितनी दुर्दशा पिछले 10 सालों में गायों की हुई है उतना भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था।
अभी ताजा मामला जैसलमेर के राजस्थान का है जहां हजारों गायों के भूख और बीमारी से मरने की खबर ने पूरे देश को हिला दिया था। जनवरी में चंडीगढ़ में 100 गायों की मौत हुई, छतरपुर में 50 गाए मरी, भीमपुरा राजस्थान में सैकड़ों से ज्यादा गाएँ मरी , 2024 -25 में श्रावस्ती और ललितपुर मैं सैकड़ो गायों के मरने से उत्तर प्रदेश में हड़कंप मच गया था। यह सब मौते प्रशासनिक देखरेख और गौशालाओं में हुई है जहां के लिए सरकार विधिवत बजट पास कर रही है।इसके अतिरिक्त सड़कों ,गलियों में जो लाखों गायें भूख ,बीमारी,से दर –दर भटक रही है उसका तो कोई हिसाब ही नही । अगर गौ रक्षों तथा इसके नाम पर राजनीति करने वाले लोगों को जरा भी इनकी चिंता है तो सचमुच उनके लिए उचित प्रबंध करें। और इसके लिए किसी दिखावे तथा हंगामे की भी जरूरत नहीं है। बस जो लोग भी अपने आप को हिंदू मानते हैं, इन गायों को दया के नाम पर दो रोटी देते हैं वे सभी इन्हें अपने घर में पाले इनकी सेवा करें। शनिवार और सोमवार को दो गुड़ और दो रोटी से इनका पेट नहीं भरने वाला।
अब लौटते हैं मॉब लिंचिंग के मामले पर। 2015 में मोहम्मद अखलाख का मामला आप शायद भूल गए हो उनके परिवार पर गौ मांस खाने का झूठा आरोप लगा करके ग्रामीणों ने उन्हें पीट-पीट कर मार डाला। 2017 में राजस्थान के अलवार में पहलू खान को गौ तस्करी के नाम पर भीड़ द्वारा पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। 2017 में हरियाणा की एक लोकल ट्रेन में 16 वर्षी जुनैद खान को भी इसी तरह की अफवाह की वजह से मार दिया गया था। झारखंड में भी बच्चा चोरी के नाम पर इसी प्रकार मुसलमान की लिंचिंग की गई थी। 2002 में हरियाणा में भी पांच दलितों की गौ रक्षकों ने कुछ इसी प्रकार के मामले में हत्या की थी। ऊना कांड भी इसी प्रकार का मामला है। इन सभी मामलों में हजारों से ज्यादा लोग दोषी और अपराधी है, इनमें से ज्यादातर लोग आज अपना सामान्य जीवन जी रहे हैं।
 पर नजीर के इस मुकदमे ने मॉब लिंचिंग केस को एक नया मोड़ दे दिया है। देश में एक आशा का सृजन होते दिखाई दे रहा है।क्योंकि भीड़ द्वारा बढ़ते हुए ऐसे अपराध को रोकने के लिए भारत में 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय न्याय संहिता में मॉब लिंचिंग को पहली बार अलग अपराध के रूप में मान्यता दी गई है । धारा 103(2) BNS के अनुसार जब 5 या अधिक व्यक्तियों का समूह मिलकर नस्ल, जाति, समुदाय, लिंग, जन्म स्थान, भाषा, व्यक्तिगत विश्वास या किसी अन्य आधार पर हत्या करता है, तो इसे मॉब लिंचिंग माना जाता है । जज तबस्सुम खान ने इसी कानून के हवाले से नज़ीर के दोषियों को उम्रकैद की सजा सुने है ।अब देखना ये है कि क्या नज़ीर का यह मामला एनी मॉब लिंचिंग के लिए भी एक “नज़ीर” बन सकता है । 

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