ये अम्बेडकरवाद की आंधी हैं


एक व्यंग के रूप में उपजी सोशल मीडिया द्वारा स्थापित कॉकरोच जनता पार्टी ने जिस प्रकार से आज देश में सत्ता के खिलाफ बिगुल फूंका है सत्ता पक्ष में बैठे लोगों ने उसकी कल्पना भी नहीं की होगी. इस सोशल मीडिया द्वारा उठाए गए सवाल और तूफान ने हमारे सामने तीन सवाल खड़े किए हैं. पहला जिम्मेदार पदों पर बैठे हुए लोग कब तक अमर्यादित भाषा का उपयोग करेंगे ? दूसरा सत्ता में बैठे हुए लोग शिक्षा से कब तक मजाक करेंगे? और आखिरी,शिक्षित युवाओं के लिए सरकार कब संवेदनशील रहेगी?
    वर्तमान में जो जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी और उसके संस्थापक अभिजीत दीपके द्वारा आंदोलन खड़ा किया गया है उसकी बुनियाद 15 मई को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त जी द्वारा दिए गये उस विवादित बयान से हुआ है जिसमे उन्होंने कहा था "कुछ युवा कॉकरोच (तिलचट्टों) की तरह हैं, जिन्हें अपने पेशे में कोई जगह या रोजगार नहीं मिलता. इनमें से कुछ मीडिया, कुछ सोशल मीडिया और कुछ आरटीआई (RTI) एक्टिविस्ट बन जाते हैं और हर किसी पर हमला करना शुरू कर देते हैं।" इसके साथ ही उन्होंने ऐसे लोगों को समाज का "परजीवी" (Parasites) भी कहा था. उनके इस बयान से देश भर के युवा आक्रोशित हो उठे. विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के बयान का कड़ा विरोध किया . दूसरी तरफ अमेरिका में बैठे अभिजीत दीपके ने व्यंग के रूप में कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बना दिया. देखते ही देखते देश भर में हफ्ते भर के अंदर इसके भारतीय जनता पार्टी से भी ज्यादा लोग फॉलोअर हो गए. 
   12 मई को नीट की परीक्षा खुद एनडीए द्वारा रद्द करने की घोषणा के बाद कुछ ही हफ्तों में देश भर से लगभग 12 विद्यार्थी आत्महत्या कर लेते हैं. इस घटना को कॉकरोच जनता पार्टी अपना मुद्दा बनती है और फिर अभिजीत दीपके अपने दो सहयोगियों सौरव दास एवं अनुराग रांका के साथ मिलकर 20 जून से जंतर मंतर पर आंदोलन की घोषणा करते हैं. एक हफ्ते तक इनका आंदोलन देशभर में यह संदेश पहुंचाने में कामयाब होता है कि वर्तमान सरकार किस तरह से शिक्षा तथा रोजगार पर अपनी जवाब देही नहीं तय कर पा रही है. पूरा देश देख रहा है कि वर्तमान सरकार शिक्षा के मायने में हर स्तर पर लगातार असफल हो रही है. ऐसी स्थिति में भी अगर कुछ युवा अपने उज्जवल भविष्य के लिए दिन-रात कड़ी परिश्रम करते हैं और जब कोई परीक्षा रद्द हो जाती है अथवा लीक हो जाती है तो इन 18 -19 साल के युवाओं की मनोदसा टूट जाती हैं.
 अभी जंतर मंतर पर जो गुस्सा दिखाई दे रहा है युवाओं का, दरअसल वह गुस्सा सिर्फ एक परीक्षा लिक को लेकर ही नहीं है, यह गुस्सा सरकार द्वारा लगातार भारतीय शिक्षा की स्थिति को खराब करने, नियुक्तियों में लगातार कमी, परीक्षा का समय पर नहीं होना, परीक्षाओं का टाल- मटोल करना, सरकार को खुद को कानून से ऊपर समझना, बुलडोजर से न्याय करना, दलितों पर देश में बढ़ते हमले, अल्पसंख्यकों पर लगातार अत्याचार, प्रधानमंत्री का देश और दुनिया में देश की किरकरी करवाना, 12 साल में प्रधानमंत्री द्वारा एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस ना करवाना, और वर्तमान में अयोध्या में राम मंदिर में दान की चोरी इत्यादि कई मामले शामिल है जो अब ज्वाला बन चुकी है . सरकार को लग रहा था कि यह आंदोलन सोशल मीडिया द्वारा एक मामूली प्रदर्शन हैं, इसलिए वह लगातार इसकी उपेक्षा कर रही थी. 28 जून को जब प्रख्यात वैज्ञानिक एवं समाजसेवी सोनम वांगचुक जी इस आंदोलन के साथ जुड़ जाते हैं तब इसकी गूंज देश के बाहर पहुंचने लगती है. न्यूयार्क लंदन और नीदरलैंड के शहरों से सोनम वांगचुक तथा कॉकरोच जनता पार्टी के पक्ष में वहां भी धरने होने लगते हैं. 16 जुलाई को कुछ पुलिसों द्वारा अभिजीत दीपके के साथ बदतमीजी की जाती है जिसके लिए अभिजीत प्रशासन कर्मियों से रियायत की मांग करते हैं. 17 जुलाई को आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चन्द्रशेखर सोनम वांगचुक से मुलाकात करने जंतर मंतर पहुंचते हैं. वहां आंदोलन में बैठे छात्राओं तथा सोनम वांगचुक की हालत देखकर वें द्रवित हो उठते है और सोनम वांगचुक तथा अभीजित के सहयोगियों से पूछते है की आपके आन्दोलन को मजबूत करने के लिए कितने लोग चाहिए ? आप 20 जुलाई को संसद मार्च कीजिए .अतः अभीजित के सभी सहयोगी 20 जुलाई को शांतिपूर्ण संसद मार्च की घोषणा करते इससे पहले 18 जुलाई को सुबह 4 बजे बर्बरता से वांगचुक जी को सादे कपडे में दिल्ली पुलिस के लोग उठा ले जाते है . सरकार द्वारा करवाया गया यह घृणित कार्य इस आंदोलन में जलते हुए हवन में घी का काम करता है. देशभर के युवाओं का गुस्सा सरकार के खिलाफ और उग्र हो उठता है.अतः 20 जुलाई को संसद मार्च की घोषणा की होते ही सरकार 19 जुलाई को रात से ही दिल्ली के चारों तरफ पहरेदारी मजबूत करने लगती है. पर संसद मार्च इतना विशाल इतना ताकतवर होगा इसका उन्हें अंदाजा नहीं था. इस संसद मार्च के तीन प्रमुख चेहरे जो देश और दुनिया भर में प्रमुखता से छाए रहे उसमें अभिजीत के बाद पहला नाम चंद्रशेखर और दूसरा फ़िल्म कलाकार प्रकाश राज का आता हैं. यह तीनों लोग पूरे दिन संसद मार्च के समय दिल्ली में हो रहे लगातार बारिश और आंधी के बीच पुलिस की लाठियां के सामने डटे रहे. चन्द्रशेखर अभी भी संसद भवन के बाहर खुले आसमान के नीचे एक बोरे का तिरपाल बनाकर आन्दोलन को मजबूत किए हुए है . इस बीच दिल्ली पुलिस के द्वारा इन विद्यार्थियों,शोधार्थियों,समाजसेवियों से जो अभद्रता तथा हिंसात्मक कार्रवाई की गई उसकी पूरी दुनिया में चर्चा हैं. आन्दोलन में जाने माने अभिनेता नसरुद्दीन शाह ,शबाना आज़मी और नेता डिम्पल यादव पूरा दिन बच्चों के साथ रहकर उन्हें साहस प्रदान करते दिखे थे . सरकार ने इस आंदोलन को दबाने के लिए जिस प्रकार से कायरतापूर्ण बिना वर्दी ,बिना नेम प्लेट के अज्ञात लोगों का सहयोग लिया है वह सरकार की मंसा पर बड़ा सवाल हैं.
   इस पूरे आंदोलन की जो जान थी वह इसके दो नारों में शामिल है इंकलाब जिंदाबाद और जय भीम. इस पूरे आंदोलन ने यह साबित कर दिया है कि आज देश दो विचारों में बटा हुआ है पहला जय श्री राम (राजनीतिक नारा ) दूसरा जय भीम (तार्किक राष्ट्र ). एक दशक पहले तक अंबेडकर और जय भीम का नारा सिर्फ दलित समुदाय ही लगाते थे. इसलिए अंबेडकर की राजनीति और उनके सामाजिक न्याय की लड़ाई को सिर्फ दलित राजनीति तक ही समेट कर देखा जाता था. पर जब से राजनीति में चंद्रशेखर नाम का उदय हुआ है देश ही नहीं पूरी दुनिया में जय भीम का नारा अब हर वह व्यक्ति लगाता है जो लोकतंत्र में विश्वास रखता है, समानता और बंधुता में विश्वास रखता है, एक तार्किक और नैतिक राष्ट्र चाहता है. इसलिए आज अम्बेडकरवाद यानि लोकतंत,अम्बेडकर यानि सामाजिक न्याय,अम्बेडकर यानि स्त्री शिक्षा,अम्बेडकर यानि तार्किक शिक्षा,अम्बेडकर यानि समता,अम्बेडकर यानि समानता,अम्बेडकर यानि नैतिक नागरिक,अम्बेडकर यानि पाखंड से मुक्ति,अम्बेडकर यानि सत्ता से सवाल बन चुका है .इसलिए जो भी मानवता में यकीन रखता है वो अम्बेडकरवादी है .
    इस आंदोलन में पहले दिन से ही इंकलाब और जय भीम के नारे गूंजते दिखाई दिए हैं. धर्म और जाति की राजनीति करने वाले लोगों ने कई बार इस आंदोलन को दिशाहीन करने का प्रयास किया. युवाओं को जाति के नाम पर बांटने का प्रयास किया परंतु अंततः वें असफल हुए. आज के युवा अब समझ चुके हैं कि शिक्षा ही एकमात्र रास्ता है जिसमें उनकी और राष्ट्र दोनों की उन्नति तय हैं. इसलिए यह जेन जी अब किसी धार्मिक नारे के आगे अपना भविष्य दाव पर नहीं लगाने वाली क्योंकि वे शिक्षा का महत्व अब समझ चुके हैं. इसीलिए अंबेडकर ने कहा था " शिक्षा शेरनी का वह दूध है जो जितना पिएगा वह उतना दहाड़ेगा " और हमारे मूर्ख राजनेता इसी दहाड़ से डरते हैं.

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