राजकुमार संतोषी मेरे सबसे पसंदीदा निर्देशक है. मुझे पूरी उम्मीद थी की वें फिर जरूर शानदार साबित होगे . उनके कहानी कहने का तरीका और दर्द को समझने का सलीका बहुत ही शानदार होता है.
भारत और पाकिस्तान का विभाजन एक नासूर की तरह है. जिसे जब जब याद किया जाता है मन घाव से भर जाता है. फिल्म उसी बंटवारे के समय पर आधारित है. हिंदू और मुस्लिम जो विभाजन से मुख्य तौर पर प्रभावित हुए थे,उनकी मानसिक और राजनीतिक हालात को बखूबी इस फिल्म में बताने का प्रयास किया है. दिल्ली लाहौर और पंजाब के मुसलमान हिंदू इस दुखद घटना से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे, निश्चय ही उनके दर्द का कोई हिसाब नहीं है.
पिछले एक दशक से जिस तरह से हिंसात्मक और प्रोपगंडा फिल्म बनाई जाती रहे हैं उसने हिंदी फिल्म को निराश करके रख दिया है. पर इस फिल्म ने फिर से एक नई रोशनी खोली है, जो यह बताने के लिए काफी है कि अभी भी हिंदी फिल्म के कहानिकारों के पास कहानी की कमी नहीं है. वैसे तो यह फिल्म असगर वजाहत की एक प्रसिद्ध किताब पर आधारित है. जिसमें मुख्य भूमिका में सनी देओल ने फिर से अपनी पुरानी छवि के अनुसार घायल,डकैत की तरह अभिनय करके अपने पुराने दर्शकों को निराश नहीं किया है. प्रीति जिंटा ने उनकी पत्नी का रोल बखूबी निभाया हैं.
कहानी शुरू होती है बंटवारे के उस दर्द से जब दोनों मुल्कों के हिंदू और मुसलमान अपने-अपने धार्मिक मुल्कों में मजबूरन धकेले जाते हैं. इसके मुख्य पात्र सिकंदर जो दिल्ली में अच्छे व्यापारी थे अपने परिवार पर हिंदुओं द्वारा हमले किए जाने पर किसी तरह जान बचाकर लाहौर आते हैं और एक हिंदू महिला का घर उन्हें मुहैया कराया जाता है. हिंदू महिला के तौर पर माई का अभिनय शबाना आज़मी द्वारा किया गया है. माई का भी परिवार बिखर चुका है. लेकिन अभी वह अपने घर में अपने बहू बेटे का इंतजार कर रही है. ऐसी स्थिति में सिकंदर का परिवार उनके घर में प्रवेश करता है. शुरू में सिकंदर को माई का रहना वहां बुरा लगता है. इसलिए वह उसे निकालना चाहते हैं, लेकिन माई का व्यवहार इतना कोमल होता है कि धीरे-धीरे पूरा परिवार उनसे जुड़ जाता है.
पर कहानी का जो मुख्य खलनायक है उसे लाहौर जैसे मुस्लिम इलाके में एक हिंदू महिला का रहना बिलकुल नागवार गुजरता है और वह कई तरह की तरकीबे निकालता है उस महिला को बाहर निकालने के लिए. कहानी उस समय मोड़ लेता है जब सिकंदर को माई से लगाव हो जाता हैं और वह उनमें अपनी मां देखने लगता है.
फिर आगे की कहानी हिंदू और मुसलमान के बीच मजहबी लड़ाई के तौर पर सामने आती है. और अंत में सिकंदर सारी मजहबो के सामने इंसानियत के लिए लड़ने लगता है.
फिल्म में इस्लाम के ईमान पर बहुत बारीकी से प्रकाश डाला गया है.यह फ़िल्म ऐसे दौर में आई है जहां फिर से हिंदू मुसलमान को राजनीतिक षड़यंत्र से सुलगाया जा रहा है. इसलिए बेहतर होगा कि आज के दौर के नवयुवक इसे जरूर देखें.
मैं फिल्म को बतौर एक शानदार कहानी के तौर पर पांच में से साढ़े चार अंक प्रदान करता हूं.