अगस्त माह भारतीय दृष्टिकोण से हर तरह से पवित्र और पावन माना जाता है .इस माह को हम अगस्त क्रांति के नाम से भी जानते है,हिन्दू धर्म अनुसार भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भी इस पुरे माह व्रत और अर्चना की जाती है .कालेजों में नए दाखिले होने से शहर तथा कालेज दोनों गुलज़ार हो उठते है और सबसे बड़ी बात 15 अगस्त को हम अपना राष्ट्रिय पर्व भी मनाते है . पर मै आज देश के शहीदों को नमन करने के साथ-साथ उनकी बात करना चाहता हूँ जिससे हमारा यह लोकतंत्र और मजबूत होता है .जिनकी बाते हमारे देश में यदा –कदा ही सार्वजनिक की जाती है .
इस 7 अगस्त को महान वैज्ञानिक और हरित क्रांति के जनक एमएस स्वामीनाथन की जन्म शताब्दी वर्ष पूरे हुए हैं . सवाल यह है कि आज एमएस स्वामीनाथन को कितने लोग जानते हैं ? इसी महीने विक्रम साराभाई ,रामानुजन और शांति स्वरूप भटनागर जैसे महान वैज्ञानिकों का भी जन्मदिन है आखिर इनके बारे में देश में कितनी बातें होती है ? क्या उनके योगदान को सरकार जनता तक क्या पहुंच पा रही है? आखिर इस देश में वैज्ञानिकों की उपेक्षा कब तक की जाएगी? देश के बच्चे- बच्चे से खेल खिलाड़ियों के बारे में पूछिए तो बता सकते हैं, फिल्म अभिनेताओं अभिनेत्री के बारे में पूछे तो बता सकते हैं, नेताओं से जुड़े हुए घटनाओं और उनके बयान बाजी के बारे में भी आपको पता चल जाएगा पर वैज्ञानिकों पर हमारे इस देश में ना कुछ लिखा जाता है ना पढ़ा जाता है ना बोला जाता है.
आज हम अपनी मुल्क की आज़ादी के आठ दशक पुरे कर चुके है.एक बड़ी आबादी का पेट भरना ,खुश रखना और दुनिया के साथ कदमताल करते हुए चलना हमारे लिए आज भी एक बड़ी चुनौती है .पिछले दिनों ही अभी चीन ने अंतरिक्ष में धान उगाकर एक नए वैज्ञानिक क्रांति कि जंग छेड़ दी है .वह ऐसे बड़े-बड़े कारनामे आये दिन करता रहता है .पर आज भी हमारे राजनेता बड़े चतुराई से धार्मिक अथवा जातिगत नायको पर आए दिन बोलते रहते हैं परंतु उन्हें वैज्ञानिकों के बारे में कोई जानकारी नहीं होती. जबकि आज हमारा संपूर्ण जीवन विज्ञान के आसपास ही घूमता है. इनमें वे लोग भी शामिल है जो विज्ञान पर सवाल उठाते हैं और विज्ञान का विरोध करते हैं पर मजे की बात ये है कि वह विरोध भी विज्ञान तकनीक के सहारे ही करते हैं.
भारत की समस्या यह रही है कि वह शिक्षा से हमेशा मुंह मोड़े खड़ा है. दुनिया शिक्षा -अनुसंधान और तकनीकी पर अपनी बजट बढ़ा रही है तो हमारा घटता जा रहा है. अमेरिका, जापान, चीन, कोरिया जहां अपने बजट का 3 से 4% शोध और वैज्ञानिक रिसर्च पर खर्च करते हैं वहीं भारत आज भी अपने बजट का 0.6% ही विज्ञान अनुसंधान पर खर्च करता है. आज भी हमारे राजनेताओं के भाषण में शिक्षा कोई मुद्दा नहीं होता, वैज्ञानिकों की चिंता और चिंतन की बात करना तो बहुत दूर की बात है. पिछले एक वर्ष में हमारे देश की सबसे बड़ी वैज्ञानिक संस्था इसरो से लगभग सौ से ज्यादा वैज्ञानिकों ने इस्तीफा दे दिया है अथवा देश छोड़ दिया है. यह विषय आखिर हमारे समाज का मुद्दा क्यों नहीं है? एक रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश से जितने भी लोग वैज्ञानिक या विज्ञान की शिक्षा के लिए विदेश जाते हैं उनमें से 73% अपने वतन लौट कर नहीं आते, सवाल है आखिर क्यों?
हमारे देश में जहां 80% लोग आज भी 5 किलो राशन के लिए लाइन में लगते हैं. अनुसूचित जाति जनजाति तथा आदिवासियों के बच्चे आज भी सरकारी स्कूलों ( जानबूझकर स्थिति ख़राब की गई है ) पर निर्भर हैं जहां के विद्यालयों में विज्ञान प्रयोगशाला तो दूर विज्ञान के शिक्षक तक भी उपलब्ध नहीं होते. आज भी गरीबों के परिवार से बहुत ही कम विद्यार्थी विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाते हैं. दरअसल विज्ञान की शिक्षा मानविकी शिक्षा से कहीं महंगी पड़ती है, इसकी पुस्तक तथा संसाधन साधारण पुस्तकों से महंगे पड़ते हैं. और यदि आपका बच्चा सरकारी विद्यालय ,कॉलेज में पढ़ रहा है तो वहां लैब तथा प्रयोगशाला ना होने की वजह से उसे समझने में और भी मुश्किलें होती है जिसके लिए उसे ट्यूशन तथा कोचिंग का सहारा लेना पड़ता है जो की काफी महंगा पड़ता है. इसीलिए देश की बहुत बड़ी आबादी विज्ञान के शिक्षा से बहुत दूर हो जाती है. और यह वह आबादी होती है जिसे बाबा,कथावाचक, फकीर, मौलवी, पादरी झूठी मायावी दुनिया कि झूठी कहानी में फंसा कर पाखंड और कर्मकांड में उलझा देते हैं.
हमारा देश प्रतिभा का मोहताज नहीं रहा है. बस सही अवसर और सही व्यवस्था की कमी की वजह से हम समय पर वह चीज नहीं प्राप्त कर पाए जिससे हम दुनिया में पिछड़ गए. ऐसा नहीं है कि आज विज्ञान और तकनीकी में हमारी कोई पहचान नहीं है. पर हर चीज हम तब करते हैं जब दुनिया कर लेती है. कभी अपने आसपास की चीजों पर नजर उठा कर देखिए. आपके जीवन को सरल करने वाले वस्तुओं पर नजर डालिए उन वस्तुओं के खोज में भारत की कितनी हिस्सेदारी है इससे विज्ञान में हमारी स्थिति का अंदाज़ा लग जाएगा ? जब पहली बार बाबर हमारे देश में आया तब उसके पास तोपे और अत्याधुनिक हथियार थे जिसका खामियाजा हमें लंबे समय तक उठाना पड़ा. अंग्रेज भी हम पर तभी काबिज हो पाए जब उनके पास अत्याधुनिक हथियार थे. द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका तकनीक के ही दम पर दुनिया का दादा बन पाया था .यानी हम जितनी भी लड़ाइयां हारे हैं उन सब में तकनीकी का ही सबसे बड़ा योगदान रहा है. और आगे भी दुनिया में वही देश आगे तथा सक्षम होंगे जिनके पास अत्याधुनिक तकनीक रहेगी. विज्ञान की शिक्षा सिर्फ हमें अपनी सुरक्षा के लिए ही तैयार नहीं करता बल्कि हमें तार्किक भी बनाता है. हम हजारों साल तक महिलाओं को ही पुरुष(बालक) पैदा करने के लिए जिम्मेदार मानते रहे, यह बात कितनी सच्ची है विज्ञान से ही हमें मालूम हो पाया हैं वरना आज तक हम महिलाओं की बलि चढ़ाते रहते हैं. जनसंख्या नियंत्रण के उपाय हम विज्ञान के तरीके से ही कर पाए अन्यथा हम तो भाग्य भरोसे ही बैठे थे. पर भारत में आज भी न जाने कितने लोग हैं जो विज्ञान की छोटी सी छोटी बात को भी नहीं जान पाते इसलिए जरूरी है कि अब हम देश के हर घर तक विज्ञान की शिक्षा को भी पहुँचाने का काम करें. देश तार्किक होगा तो कई समस्याओं का समाधान स्वयं भी हो जाएगा. इसलिए सभी राजनेताओं और व्यवस्था में बैठे लोगों से गुजारिश है कि वह अपने भाषणों में, मंचों में, बहस में वैज्ञानिकों का भी जिक्र करें. और उनका भी जन्मदिवस धूम से मनाये, चौराहे पर मूर्तियां स्थापित करें.तो आइये इस वर्ष हम अपनी आज़ादी वैज्ञानिकों को समर्पित करते हुए मनाते है .जय जवान ,जय किसान ,जय विज्ञान.