सचमुच में दुनिया को दिशा देने के लिए एक नई क्रांति की जरूरत होती है. इतिहास गवाह है दुनिया को बदलने में युवाओं ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. महात्मा बुद्ध, प्रभु यीशु,न्यूटन, गैलिलियो,स्वामी विवेकानंद, भगत सिंह, ध्रुव राठी इत्यादि ऐसे महान हस्तियों में से हैं जिन्होंने अपने युवावस्था में दुनिया को एक नई राह दी है.
आज जब पूरे विश्व के बड़े-बड़े लोकतांत्रिक देशों का नियंत्रण वृद्ध हो चुके नेताओं के हाथ में है, शायद यही वजह है कि पिछले एक दशक से पूरे दुनिया में युद्ध, उन्माद, संघर्ष के हालात बने हुए. यह वृद्ध नेता किसी भी सुरत में सत्ता से हटने वाले नहीं है. चाहे दुनिया तबाह हो जाए चाहे देश तबाह हो जाए. ऐसी स्थिति में जब हमारे पड़ोसी देश नेपाल की बागडोर एक युवा के हाथों में पहुँचती है तो भारत सहित पूरी दुनियां के लिए एक अच्छा संदेश पहुंचता है.गत 27 मार्च को जब बालेंद्र शाह ने मात्र 35 वर्ष की उम्र में नेपाल के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली तब उन्होंने राज्य सुधार के लिए कई लक्ष्य निर्धारित किया जिसमें उन्होंने अपने पूर्ववर्ती शासन और सदियों से चले आ रहे अपने देश में रह रहे दलितों, शोषितों, के साथ हुए अन्याय के लिए सदन में राष्ट्र की तरफ से माफी मांगी और इस स्थिति में आगे सुधार के लिए घोषणा की. बता दे कि पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में भी भारत की तरह ही जाति व्यवस्था कार्य करती है. वहां भी चतुर्वर्ण व्यवस्था कायम है. नेपाल में कुल लगभग 14% दलित जातियां निवास करती है. यहां के दलितों के साथ भी वहां की सामंत जातियां उसी प्रकार दुर्व्यवहार करती है जिस प्रकार से भारत की सामंत जातियाँ. नेपाल के दलित जातियों को भी अतीत में स्कूलों में मंदिरों में प्रवेश वर्जित था. रोजगार,शिक्षा,संपत्ति में आज भी उनकी स्थिति भारत के दलितों जैसी ही है.
नेपाल के युवा प्रधानमंत्री ने तो अपने देश को चेतना में लाने का कार्य आरंभ कर दिया है पर हमारा देश कब करेगा. नेपाल के इसी प्रधानमंत्री का जिक्र करते हुए 30 मार्च को आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और नगीना लोकसभा के सांसद चंद्रशेखर आजाद ने भी सदन में सवाल उठाया कि हमारा देश हजारों साल से दलितों आदिवासियों के साथ होने वाले भेदभाव, उत्पीड़न, हिंसा, अमनवीयता के लिए कब माफी मांगेगा. उन्होंने कहा कि कानून में तमाम प्रावधान होने के बावजूद भी आज भी दलित वंचित समाज के लोग हासिए पर है और उनके साथ आज भी भेदभाव उत्पीड़न जारी है. ऊना कांड पर प्रधानमंत्री ने रोते हुए कहा था कि मेरे दलित भाइयों को मत मारो मारना है तो मुझे मारो. प्रधानमंत्री इस तरह की बेतुका बयान बाजी तो करते रहते हैं परंतु उन्हें मालूम होना चाहिए कि प्रधानमंत्री के पद में इतनी ताकत हैं कि वें चाहे तो महीनों में दलितों पर होने वाले अपराध और अपराधी गिड़गिड़ाते फिरेंगे. देश ने उन्हें प्रधानमंत्री का पद आंसू बहाने के लिए नहीं दिया है और आंसू बहाने से किसी समस्या का हल भी नहीं हो सकता. इसके लिए आपको कुछ कठोर कदम उठाने होंगे, और मैं समझता हूं कि उनमें सबसे पहला काम प्रधानमंत्री को यह करना चाहिए कि देश के दोनों सदन के सभी सदस्य एक साथ बाबा साहब के प्रतिमा के सामने हाथ जोड़कर यह कहें कि इस देश में दलितों,आदिवासियों के साथ जाति आधारित जितनी भी हिंसा हुई हैं, नरसंघार हुए हैं,भेदभाव किए गए हैं उसके पीछे चाहे जो भी कारण हो.. जो भी व्यक्ति हो, संस्था हो, समाज हो इसके लिए हम आज हृदय से शर्मिंदगी महसूस करते हैं, दुःखी हैं और दंडवत होकर के माफी मांगते हैं.
मैं समझता हूं इससे कानूनी रूप से तो कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. परंतु ऐसे अपराध करने वालों आत्म बल,मनोबल जरूर टूटेंगे. ऐसे लोग समाज में गर्व से जाति के आधार पर भेदभाव करने से डरेंगे और दलितों को आत्म बल प्राप्त होगा. पर जो देश पुनः मनुस्मृति की बात करता हो, जिस देश के उच्च न्यायालय में आज भी मनु महाराज के प्रतिमा लगी हो, जिस देश में आज भी उच्च न्यायालय में बाबा साहब की प्रतिमा लगाने के लिए लोगों को संघर्ष करना पड़े क्या उस देश के प्रधानमंत्री यह काम करने का साहस कर पाएंगे?
