एक पुस्तक एक राष्ट्र का बने कानून


.            (फोटो साभार सोशल मीडिया )

 अप्रैल से स्कूलों में नए बच्चों का दाखिला शुरू हो जाएगा. देश के वें बच्चे जो निसहाय है, गरीब हैं, दलित -आदिवासी हैं वह सरकारी स्कूलों की तरफ रुख करेंगे और मध्यम वर्ग तथा धनाढय परिवार के बच्चे निजी विद्यालयों में पहुंचेंगे.जिनके जेब में जितना पैसा वो उतने बड़े स्कूल में पहुंचेगा . पिछले तीन दशकों से हम यही कर रहे हैं ( उसके पूर्व विद्यालयों में किताबी भेदभाव उस प्रकार नहीं था जिस प्रकार आज है) देश की भावी पीढ़ी को हम बचपन से ही दो हिस्से में पाल रहे हैं. और फिर जब यह बड़े होकर सरकार से रोजगार तथा समानता का अधिकार मांगते हैं तो उनके लिए हम एक लाइन खींचना चाहते हैं. जबकि बचपन से ही दोनों के विवेक में अलग-अलग प्रकार की विचारधाराओं को बोने का हम कार्य करते आ रहे हैं. याद करिए 90 दशक की विद्यालयी शिक्षा उस दौर में मुश्किल से एक गांव में एक ही विद्यालय हुआ करता था, निजी स्कूल आज की भांति गली -गली में नहीं पनपे थे वे प्राय शहरों में अथवा गांव से काफी दूर होते थे जहां तक बमुश्किल से दो-चार बच्चे ही पहुंच पाते थे. बाकी सभी गांव के एक ही स्कूल में साथ-साथ पढ़ते थे. ग्राम प्रधान के बेटे से लेकर गांव के एक साधारण परिवार का बच्चा तक सब साथ में पढ़ते थे. आज आप किसी गांव के स्कूल में किसी ग्राम प्रधान के बेटे को तो छोड़िए आप उस स्कूल के चपरासी के बच्चों को भी उस स्कूल में नहीं देखेंगे. मैं यह नहीं कहता की तब स्थिति बहुत अच्छी थी पर जिस प्रकार से निजी स्कूलों का चलन देश में बढ़ने लगा उससे स्थिति और भी बद से बदत्तर होने लगी हां आप इस बात से संतुष्ट हो सकते हैं उस दौर की अपेक्षा इस दौर के बच्चों की अंग्रेजी थोड़ी अच्छी हो चली थी परंतु इसके लिए उन परिवारों ने बहुत बड़ा रकम भी खर्च किया है. मुझे ना ही निजी विद्यालयों से समस्या है ना ही अंग्रेजीयत से मुझे समस्या है इन सब के नाम पर समाज की लूट, शिक्षा का फर्जीवाड़ा और शिक्षा के बिगड़ते हालात से.
 आज आप अपने बच्चों का जब किसी निजी विद्यालय में दाखिला करवाने जाते हैं तब आपको दाखिले से लेकर के बच्चे के यूनिफॉर्म तक के भारी भरकम पैसे चुकाने पड़ते हैं. और यह सब आपके विद्यालय अथवा विद्यालय के सुझाए गए दुकानों पर ही प्राप्त हो सकता है. कक्षा एक के बच्चों का भी पुस्तकों का दाम सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे. 40 -50 पेज की एक किताब के लिए आपको 300 से ₹400 अदा करने पड़ते हैं. यूनिफॉर्म के हजारों रुपए अलग से यानी एक साधारण निजी विद्यालय में क्लास वन के बच्चों के दाखिले के लिए आपको कम से कम 10 से 15000 रुपए खर्च करने पड़ेंगे. 
UDISE के मुताबिक देश में कुल 14 लाख 71443 विद्यालय हैं, जिनमें 68.9% सरकारी हैं 79 % सहायता प्राप्त और 23.1% निज़ी विद्यालय.सरकारी विद्यालयों में लगभग देश के 50 -55 % बच्चे पढ़ते हैं और निजी विद्यालय में 40% अन्य मदरसे, गुरुकुल तथा मान्यता प्राप्त विद्यालय में हैं. 90 दशक के पढ़ने वाले बच्चों के एक ही पुस्तक से दो-तीन वर्ष निकल जाते थे. उस एक पुस्तक को पहले बड़ा भाई पढ़ता था उसके बाद छोटा भाई और बच गया तो फिर कोई और, इस प्रकार एक ही पुस्तक कई वर्षों तक पढ़ने के लिए काम आता था. एक कक्षा की कहानिया सभी विद्यार्थियों को सालों याद रहती थी. पूर्वी क्षेत्र में दो बैलों की कथा, गिलहरी की कथा, परशुराम संवाद, ईस्ट इंडिया कंपनी का इतिहास, सिंधु सभ्यता का इतिहास इत्यादि सबको एक ही चैप्टर पढ़ाया जाता था जिसे पढ़कर पूरी पीढ़ियां विकसित होती थी. उस दौर में जब किसी परिवार का बच्चा अगली कक्षा में पहुंचता था तब अभिभावक रिश्तेदारों से पता करते थे कि उनका बच्चा किस कक्षा में है यदि उनके परिवार का कोई बच्चा अगली कक्षा में जा रहा है तो उस बच्चें की पुस्तक संभाल कर रखने के लिए कहा जाता था. 
इससे समाज और शिक्षा दोनों का देश को लाभ मिलता था. सामाजिक रूप में परिवारजनों को हर वर्ष पुस्तक खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी और राष्ट्रीय स्तर पर सभी विद्यार्थियों में एक ही प्रकार का शिक्षा प्राप्त होता था. इससे आर्थिक दोहन और प्राकृतिक दोहन दोनों का फायदा होता था पर आज प्रकृति की भला किसे पड़ी है? 
     आजकल निजी विद्यालय तों छोड़िए सरकारी विद्यालयों में भी दो-चार वर्ष में पुस्तकों के पाठ्यक्रम बदलते रहते हैं जिससे कि बच्चों को हर वर्ष नए किताब लेने की आवश्यकता पड़ती है. आखिर पुस्तकों के पाठ्यक्रम में हर वर्ष प्रतिवर्तन करने के पीछे सरकार की क्या मंशा होती है , दशकों में बदला जाए तो बात समझ में आती है. इसलिए मेरा मानना है कि सरकार को इस ओर ध्यान देने की अति आवश्यकता है. उसे अपने पाठ्यक्रम दुरुस्त करने चाहिए जो कम से कम एक दशक तक तो आसानी से स्कूलों में पढ़ाया जा सके.
 निजी विद्यालय हर वर्ष पुस्तकों के पाठ्यक्रम इस लिए बदलते हैं ताकि उनको हर वर्ष बड़ा मुनाफा प्राप्त हो सके. क्योंकि आज शिक्षा सेवा नहीं व्यवसाय बन चुका है, शुद्ध और सम्मानित व्यवसाय. इस व्यवसाय से आपको सामाजिक और आर्थिक दोनों प्रकार का लाभ प्राप्त होता है. आज निजी विद्यालय शिक्षा से कहीं ज्यादा होटल की तरह निर्मित किये जा रहे हैं. विद्यार्थियों के लिए संपन्न क्लासरूम अच्छी बात है परंतु इसके लिए एक परिवार को अपनी बड़ी संपत्ति दाव लगानी पड़े यह कहाँ तक ठीक हैं, और जब एक अभिभावक यह सब भी खर्च करने को तैयार है तो क्या उसके बच्चे को वह सब हासिल हो पाता है जो वह चाहता हैं? इसलिए विद्यालय को सिर्फ विद्यालय ही रहने दीजिए उसे होटल मत बनाइए.
    अगर सरकार राष्ट्र को उन्नत देखना चाहती है. वह चाहती है कि भविष्य में देश के सभी नागरिक आपस में मिल जुल कर रहे हैं तो उन्हें शिक्षा की बुनियाद मजबूत और समान करने की आवश्यकता है. इसके लिए आवश्यकता है कि सरकार एक ऐसा कानून बनाए जिससे देश के सभी विद्यालय में चाहे वह निजी हो धार्मिक हो अथवा सरकारी सभी के पाठ्यक्रम एक हो . हां आप स्थानीय भाषा तथा संस्कृति के नाम पर अपने राज्य में एक अलग पुस्तक चला सकते हैं. परंतु गणित,विज्ञान, अथवा इतिहास भूगोल के लिए अलग-अलग पुस्तकों को रखने की कोई आवश्यकता नहीं है . इससे बच्चों को एक प्रकार का ही शिक्षा प्राप्त होगा तथा निजी विद्यालयों का गोरखधंधा भी रोका जा सकता है. जब सभी विद्यार्थियों में एक ही प्रकार की शिक्षा हासिल होगी, तब भविष्य में विचारधाराए भी एक ही प्रकार की ही उन्नत होगी और सभी को किसी भी नौकरी के लिए अलग से शिक्षा हासिल करने की भी आवश्यकता नहीं होगी. तभी हम सबके लिए समानता की एक लाइन खींच पाएंगे.


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