दलित राजनीति के जननायक मान्यवर कांसीराम

   
बात 1965 की है बाबा साहब के जन्म दिवस पर छुट्टी न मिलने के कारण को मान्यवर कांसीराम ने बाबा साहब का अपमान समझा और एक सुख सुविधा वाला जीवन त्याग कर संघर्षों का रास्ता चुना, और कसम खाई अपने पूरे जीवन को बहुजन सेवा में समर्पित करने की.यह वह दौर था जब दलित पिछड़े,शिक्षा संपत्ति और शासन पर शून्य के समान थे. उन्होंने शपथ ली कि अब कभी घर नहीं जाएंगे, अपने व्यक्तिगत सुख सुविधा के लिए कुछ भी इकट्ठा नहीं करेंगे, विवाह तक नहीं करेंगे और निकल पड़े साइकिल पर बैठकर अपने 85% शोषित वंचित समाज को जगाने. बाबा साहब ने तो संविधान में वंचित समाज के अधिकारों के लिए बहुत कुछ दे दिया था पर उसका फायदा क्या जब यह समाज अपने अधिकारों को जानता ही नहीं था. यह वो दौर था जब देशभर में दलित बस्तियों में कई नरसंहार हो चुके थे.आज जिस प्रकार बाबा साहब अंबेडकर के हर विचार हर किताब हर प्रतिमा पर लिखा पढा बोला जा रहा है,क्रिया प्रतिक्रिया हो रही है,देश का हर राजनीतिक दल स्वयं को दलित हितैषी साबित करने के लिए उनके फोटो अपने बैनरों पर लगाए घूम रही है इस प्रकार का क्रेज़ उस दौर में बिल्कुल नहीं था. सच कहूँ तो अम्बेडकर के विचारों से देश को रूबरू कराने में मान्यवर कांसीराम जी का बहुत बड़ा योगदान है.
       90 दशक के बाद इस क्रांति में जैसे भूचाल सा आ गया जब उनके द्वारा खड़ी की गई बहुजन समाज पार्टी देश के सबसे बड़े राज्य में सत्ता पाने में कामयाब हुई. बसपा की राजनीति दलितों, पिछड़ो और अल्पसंख्यकों को उनके अधिकार बताने में बहुत हद तक कामयाब होने लगी थी. तत्कालीन उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती द्वारा शिक्षा की क्रांति का इसमें बहुत बड़ा योगदान था. परंतु जब 2012 में बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश के सत्ता से बेदखल हुई उसके बाद उसकी विचारधारा और राजनीति भी लगातार गर्त में जाने लगी. और 2006 में मान्यवर कांसीराम की मृत्यु के पश्चात पार्टी के विचारधारा लगातार कमजोर होती गई. आज स्थिति यह है कि जिस पार्टी ने चार बार मुख्यमंत्री का पद दिया उसके पास मिलाकर चार सांसद या विधायक तक नहीं है. इधर कुछ वर्षों से बसपा सुप्रीमो के बयान जिस प्रकार के आते हैं उसे देखकर बहुत दुःख होता है क्योंकि उसका अंबेडकर और कांसीराम के विचारधारा से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं दिखता.शायद यही कारण है कि दलित राजनीति के इस लगातार पतन को देखते हुए चंद्रशेखर आजाद ने 2020 में आजाद समाज पार्टी की स्थापना कर दी और अपने पार्टी में कांसीराम का नाम विशेष रूप से जोड़े रखा ताकि जनता को यह बताया जा सके कि कांसीराम की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई. महज कुछ वर्षों में कुछ नव युवकों द्वारा खड़ी की गई यह पार्टी आज देश भर में सुर्खियां हासिल करने में कामयाब है. इसके संस्थापक बिना किसी पार्टी के सहयोग के अब लोकसभा में भी पहुंच चुके हैं और प्रतिदिन गरीबों वंचितों की आवाज उठाते रहते हैं. जिस प्रकार कांसीराम के भाषणों में, क्रियाकलाप में बागी तेवर थे वही तेवर आज चंद्रशेखर आजाद में देखने को मिलते हैं. 
चंद्रशेखर गरीबों के न्याय से कोई समझौता करना पसंद नहीं करते. वे आधी रात को गरीबों के दुख सुःख में शामिल होने पहुंच जाते हैं. चंद्रशेखर आज जो अकेले बगैर किसी मजबूत सुविधा के कर रहे हैं काश वह पिछले एक दशक से मराणासन्न पड़ी बहुजन समाज पार्टी के कार्यकर्ता कर रहे होते तो देश भर में दलितों वंचितों को कोई छू भी नहीं पाता.
       राजनीतिक रूप से आज दलित भारतीय राजनीति में शून्य पर हैं . हो सकता हो आप मेरे बात से सहमत न हो क्योँकि आज की मीडिया और सरकार यह लगातार बताने का प्रयास कर रही हैं कि देश की राष्ट्रपति आदिवासी हैं, कानूनमंत्री दलित हैं,खाद्य मंत्री दलित हैं. सरकार यूजीसी के माध्यम से दलित हित की बात कर रही हैं, पिछले एक दशक से देश की बागडोर पिछड़ी जाति के लोकप्रिय नेता के हाथों में हैं कई राज्यों के मुख्यमंत्री आदिवासी और पिछड़े समाज के लोग हैं आदि -इत्यादि.पर सच क्या हैं हम सब जानते हैं. क्योँकि यदि यह सब सच हैं तों उससे बड़ा सच ये हैं की इन सब के बावजूद दलितों पर अत्याचार और हिंसा के आंकड़े इसकी परतों को खोल दें रहें हैं. ये बात सच हैं की उपरोक्त बताये गए पदों पर अवश्य हासिए के लोग काबिज़ हैं पर वें अवसरवादी और कागज़ के बने हुए लोग हैं. क्योंकि इनके रहते हुए देश भर में इतने घिनौने अपराध तथा हक़मारी के कार्य हुए हैं जिनपर यदि शोध किया जाय तों इन पदों पर बैठें हुए लोग सामंती दलित साबित होंगे. और इसे मान्यवर कांसीराम के शब्दों में बयान किया जाय तों ये राजनीतिक चमचे हैं और कुछ नहीं. फिर भी यदि आपको लगे कि कुछ नेता जोर जोर से जय भीम के नारे लगाते हैं तो वे आपके हितैषी हैं तब उनको परखने के लिए कांसीराम के नारों साथ उन्हें जोड़ने की कोशिश करें और देखें की वे इनके कितने आस –पास है . ये वों नारे थे जिसने कंकाल हो रहे दलितों में जान फूंक दिया था. वोट हमारा, राज तुम्हारा, नहीं चलेगा, जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी , जो बहुजन की बात करेगा, वो दिल्ली से राज करेगा ,कांशी तेरी नेक कमाई, तूने सोती कौम जगाई ,बाबा तेरा मिशन अधूरा, कांसीराम करेंगे पूरा .
     आज देश भर में जाति जनगणना ,और हक़मारी की बात हो रही है जिसकी नींव मान्यवर कांसीराम ने बहुत पहले ही रख दी थी . वोट हमारा, राज तुम्हारा, नहीं चलेगा, का नारा इस क्रांति की सबसे बड़ी मशाल है . मै आज यह समझ नही पाता कि उनके द्वारा स्थापित पार्टी कैसे उनके विचारों को भूल गई . जिस व्यक्ति ने शोषित समाज को खड़ा करने के लिए गली –गली के धूल फांके आज उस पार्टी की मुखिया चौराहे तक नही निकलती . मान्यवर कांसीराम कहा करते थे ये राज –पाठ घर में बैठकर नही मिलता इसे छिनना पड़ता है और हमारे दलित नेता घर में बैठे इसे हासिल करना चाहते है .भारतीय जनता पार्टी की आज भले हम कितनी भी निंदा कर ले पर इस पार्टी के लोग हमेशा आपको चुनावी मूड में मिलेंगे .गली – गली प्रचार करेंगे ,अनाप –शनाप बोलकर सुर्खियों में रहेंगे और अबसे बड़ी बात इनके बीच का कोई व्यक्ति कितने भी बड़े अपराध में फंस जाए उसे अकेला नही छोड़ते . और इनकी सबसे अच्छी खाशियत ये है की पार्टी में परिवारवाद दूसरों की अपेक्षा कम देखने को मिलता है ,खाशतौर पर अध्यक्ष के पद पर होने वाले चुनाव . दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, लोक जनशक्ति पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल सहित देशभर में अनेक पार्टियां हैं जो दलितों ,शोषितों के हक और अधिकार की बात तो करते है परंतु खुद को परिवारवाद के मोह से बाहर नहीं निकाल पाते, उनकी विफलता के अन्य कारणों में से एक कारण यह भी है.
. मान्यवर साहब ने अपने जीवन के आदर्शों से कभी खुद को भटकने नहीं दिया. समाज और राष्ट्र के विकास से कोई समझौता नहीं किया. व्यक्तिगत लालसा और सुख उन्होंने बुद्ध की तरह त्याग दिया था. जिससे इन पार्टियों को सीखने की जरुरत है .वर्तमान दौर में यदि उनके विचारों के आसपास कोई व्यक्ति,कोई पार्टी है तो वह आजाद समाज पार्टी है. अब देखना यह है कि चंद्रशेखर आजाद मान्यवर कांसीराम के आदर्शों को किस तरह समाज में स्थापित कर पाते हैं.

 

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