भारतीय परिप्रेक्ष्य में अल्पसंख्यक से लोग सामान्य अर्थ मुस्लिम समुदाय ही समझते हैं, और सत्ता ने भी यही साबित करने का प्रयास किया हैं.परन्तु भारतीय राजनीति में धर्म के आधार पर मुस्लिमो के पश्चात् बौद्ध, ईसाई, सिख, पारसी एवं जैन भी अल्पसंख्यक ही हैं. मानव समाज की संरचना ऐसी हुई हैं जिसमें हमेशा बहुसंख्यक ही हावी रहें हैं, फिर चाहे वह राजतन्त्र हो अथवा लोकतंत्र. लेकिन लोकतंत्र के तर्ज़ पर जब समाज की बुनियाद रखी गई तो यह प्रयास किया गया की एक ऐसी व्यवस्था निर्मित की जाएगी जिसमें सभी को समान अवसर तथा सम्मान प्राप्त होगा.
बांग्लादेश में आज सरकार स्थिर नहीं है वहां कई तरह के राजनीतिक उथल-पुथल मचे हुए हैं. धार्मिक उथल-पुथल भी उनमें से एक है. पिछले कुछ सप्ताह से लगातार भारतीय मीडिया में बांग्लादेश में हो रहे हिंदुओं की हत्या पर राजनीति गर्म है. भारतीय राजनीति में वर्तमान की जो सत्ता है उनकी सत्ता की रीढ़ है हिंदुत्व, जाहिर है ऐसे में वे अपने देश में हो रहे तमाम हलचलों को दरकिनार कर वहां हो रहे हिंदुओं की हत्या पर जरूर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकना चाहेंगे और भला क्यों ना करें सामने पश्चिम बंगाल का चुनाव भी है. लेकिन हमारी भारतीय जनता यह क्यों भूल जा रही है कि वहां हिंदू अल्पसंख्यक है और भारत में मुस्लिम सहित अन्य धर्म. वहां सरकार स्थिर नहीं है परंतु हमारे यहां तो 12 साल से सरकार स्थिर है तो क्या यहां अल्पसंख्यकों पर कम जुल्म हो रहें हैं? अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता है इसी 25 दिसंबर को ( क्रिसमस दिवस ) कुछ हिंदू नवयुवकों ने हिसार और बरेली सहित कई चर्चो में जाकर ईसाइयों को परेशान करने का कार्य किया और उनके चर्च में जाकर हनुमान चालीसा पढ़ने लगे. बिहार के बोधगया में महात्मा बुद्ध के तीर्थस्थली पर भी अनेक हिंदुत्व के संगठनों ने इस वर्ष माहौल बिगड़ने का कार्य किया और वहां कब्जा करने का प्रयास किया जिसे लेकर देश और दुनिया भर के बौद्धिष्टों को लामबंद होना पड़ा तब जाकर के प्रशासन ने इसकी जिम्मेदारी संभाली. आज प्राय देखने को मिल रहा है कि कुछ हिंदुत्व के तथा -कथित ठेकेदार मंदिर में कम चर्च और मदरसों में ज्यादा पूजा पाठ कर रहे हैं. कभी यह चर्च पर भगवा झंडा लगाने लगते हैं तो कभी मस्जिद पर. जुम्मा का नमाज यदि मुसलमान सड़क पर पढ़ने लगता है तो प्रशासन उस पर लाठी चार्ज करने लगती है. परंतु पूरे सावन के महीने में आधे भारत की सड़के आधी बंद कर दी जाती हैं तो इससे किसी क़ो कोई तकलीफ नहीं होती. नेता खुलेआम मुल्ला कहते हैं, भाषणों में गालियां देते हैं पर उन पर कोई कार्यवाही नहीं होती. क्योंकि सरकार( हिंदुत्व के एजेंडे वाली )को पता है कि उनकी सत्ता उनके बगैर भी बन सकती है, इसलिए इनके लिए कोई नियम कोई संविधान मायने नहीं रखता. सारा खेल लोकतांत्रिक सत्ता का है. हमें यह तो दिखाई देता है कि बांग्लादेश , पाकिस्तान में हिंदुओं को परेशान किया जा रहा है पर हमें यह क्यों नहीं दिखाई देता कि हमारे देश में अल्पसंख्यकों को परेशान किया जा रहा है? इसका एक ही अर्थ है कि इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में जो जहां अल्पसंख्यक है उनकी स्थिति नरकीय है.
मुस्लिम बड़ी संख्या में है इसलिए उन पर हमला ज्यादा हैं पर जो छोटे अल्पसंख्यक है अब वें भी सुरक्षित नहीं है. कभी उन्हें विदेशी धर्म होने का ताना देकर मारा जा रहा है तो कभी पराया धर्म बोलकर पीटा जा रहा हैं. खुद के लिए तो घर वापसी के नाम पर बड़े-बड़े धार्मिक आयोजन किये जा रहे हैं लेकिन दूसरे धर्म के लोग यदि धार्मिक आयोजन करते हैं तो उन्हें धर्म परिवर्तन के नाम पर परेशान किया जा रहा है.
लोकतंत्र में यह अल्पसंख्यक का जहर सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं है परंतु जातियों तक फैली हुई है. जिस गांव, नगर में जो जाति कम संख्या में हैं उनके साथ भी लोकतांत्रिक भेदभाव किया जाता है. स्थानीय प्रशासन जल्दी उन तक ना पहुंचती है ना ही उनके लिए कोई सरकारी सुविधा ही पहुँच पाती है . आज भी गांव में ग्राम प्रधान और पंचायती चुनाव में जो जातियां कम संख्या में है उनके व्यक्ति का चुनाव जीतना बहुत मुश्किल होता है. (सवर्ण जाति क़ो छोड़कर क्योंकि इनके पास सम्पत्ति के साथ - राजनीतिक अनुभव हैं ). हमारे जातीय व्यवस्था में आने वाले कुछ ऐसी जातियां हैं जिनकी संख्या ग्रामीण स्तर पर बहुत कम देखने को मिलती है. नाई, धोबी,कहार, कोल, निषाद ऐसी ही कुछ जातियां हैं जिनका प्रतिनिधित्व लोकतांत्रिक व्यवस्था में बहुत कम देखने को मिलता है. यह कम संख्या में है तो राष्ट्रीय राजनीति से लेकर के ग्रामीण राजनीति तक में इन्हें उपेक्षा (राजनीतिक )की दृष्टि से देखा जाता है. सत्ता के माहिर लोग उन जातियों के आगे पीछे घूमते हैं जिनकी संख्या भारी होती है. वे जानते हैं कि इन वोटो से उनकी सत्ता बदल सकती है, इसलिए ज्यादा संख्या वाली जातियां लोकतांत्रिक व्यवस्था में ज्यादा मायने रखती है. नतीजन इनकी गलियों में सरकारी सुविधा या तो पहुंचती ही नहीं है यह तो बहुत देर से पहुंचती है. इनके लिए रोजगार, आवास, शिक्षा और सामाजिक विकास की बातें यदा -कदा ही देखने को मिलती है. आज भी जब ग्रामीण स्तर पर ग्राम पंचायत का चुनाव होता है तो यदि उस गांव में दलितों की संख्या अपेक्षाकृत कम है तो उन्हें गांव की संभ्रान्त जातियां मिलकर चुनाव लड़ाती है और जीतने के बाद उसे रबर स्टैंप के रूप में प्रयोग करते है.
अब लौटते है उस अल्पसंख्यक समाज पर जिसे गाली देकर ही वर्तमान सरकार सत्ता में बनी हुई है.दिल्ली के एक मेरे अच्छे मित्र जो एक मुस्लिम अल्पसंख्यक है उनसे मैंने पूछा कि वह अपने समाज को इस लोकतंत्र में कहां पाते हैं तो उन्होंने कहा कि हम राजनीतिक रूप से इस देश में कभी भी सत्ता नहीं प्राप्त कर सकते. उनका अभिप्राय प्रधानमंत्री पद से था. क्योंकि हमारे देश में सत्ता की ताकत प्रधानमंत्री के ही हाथों में होती है, राष्ट्रपति का पद तो बस एक औपचारिक भर रह गया है. उनका कहना था कि हो सकता है एक बार दलित इस देश का प्रधानमंत्री बन जाए पर मुस्लिम को कभी भी प्रधानमंत्री बनने नहीं दिया जाएगा क्योंकि उसे हमेशा अपने देशभक्त होने का सबूत पेश करना पड़ता है.इस देश में सिख, जैन, इसाई सभी प्रधानमंत्री बन सकते है जबकि मतदान के प्रतिशत से यह अन्य मुस्लिमों से कही कम है. क्योंकि यहां मुस्लिम पढ़े तो दिक्कत है लड़े तो दिक्कत है. शायद इसी हताशा के कारण कभी-कभी कुछ बच्चे बड़ी गलतियां कर जाते हैं, लेकिन वह भूल जाते हैं कि ऐसी गलतियां दूसरों को माफ है परन्तु उन्हें नहीं.
तो सवाल अब यह उठता है कि देश के 77 वें गणतंत्र दिवस में पहुँच जाने पर हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था में इन सवालों का क्या जवाब है. क्या हम एक ऐसी व्यवस्था धरातल पर नहीं ला सकते जिसमें सभी वर्ग के उपेक्षित जातियों ,धार्मिक अल्पसंख्यक़ो के बगैर सरकार बनना मुश्किल हो ताकि कोई लोकतांत्रिक पद पर बैठा हुआ व्यक्ति यह कहने की जुर्रत ना कर सके कि हमें तुम्हारे वोट की जरूरत नहीं. और अगर ऐसा कोई कहता है तों मैं समझता हूं कि हमारा गणतंत्र अभी अधूरा है.
(फोटो सोशल मीडिया साभार )