उत्तर प्रदेश जैसी घनी आबादी से निकलकर मैंने जुलाई 2023 में अपना शैक्षणिक कार्य बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर छत्तीसगढ़ से प्रारंभ करने का निर्णय लिया. और यहां के श्री शंकराचार्य प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी भिलाई से अपनी शुरुआत की. सच मानिए इस शहर में आकर एक अलग सा सुकून महसूस किया. आप उत्तर प्रदेश के किसी भी शहर में जाइए वहां की भीड़ -भाड़ वाली जिंदगी से बहुत जल्द ही ऊब जाएंगे. मैंने पूर्वोत्तर भारत के अनेक हिस्सों में घूम कर देखा हैं पर यहां के लोग जितने सरल और सह्रदय हैं उतना कही नहीं हैं . ऊपर से शंकराचार्य का अपना हरा भरा सालीन कैंपस जिसकी बात ही निराली थी. 15 अगस्त 2023 को मैंने पहली बार शंकरा ग्रुप के मालिक, गंगाजली एजुकेशन सोसाइटी के अध्यक्ष इंद्रजीत प्रसाद मिश्रा जिन्हें पूरा छत्तीसगढ़ आई पी मिश्रा जी के नाम से जानता है कों देखा. मेरे सामने एक 85 साल का बुजुर्ग तिरंगे कों सलामी दे रहा था. वह व्यक्ति बिना सहारे के तकरीबन डेढ़ घंटे तक बोलता रहा. कार्यक्रम समाप्ति के बाद मेरे हेड ऑफ डिपार्टमेंट डॉ जोशी नें मुझे फोन कर 15 अगस्त के कार्यक्रम की खबर बनाने के लिए कही. और फिर जो मेरे हाथ सूचना लगी वह देखकर मैं चौक गया. मालूम हुआ कि इतने बड़े संस्था के मालिक नें 60 साल भिलाई स्टील प्लांट में बतौर इंजीनियर और अनेक उच्च पदों पर नौकरी करने के पश्चात भिलाई शहर को सजानें में लग गए. 1999 में आई पी मिश्रा ने भिलाई में अपना पहला कॉलेज खोला. यहां के बासिंदो को तब पता होगा की जुनवानी और दुर्ग के आसपास की स्थिति 30 साल पहले कैसी थी. ना कोई वाजिब सड़क था ना ही कोई बिजली की व्यवस्था या कल कारखाने. सड़क के नाम पर चारों तरफ पेड़ और कंकड़ पत्थर थे.परन्तु आई पी मिश्रा की हौसले इनसे कमजोर नहीं होने वाले थे. वह बहुत ही दृढ़ संकल्पित और हिम्मती व्यक्ति है. उन्होंने पूरा साहस करके अपने कॉलेज का कार्य आरंभ कराया. मात्र 27 बच्चों से प्रथम सत्र संचालित किया गया. और इस प्रकार आज शंकराचार्य ग्रुप तथा गंगाजली एजुकेशन सोसाइटी द्वारा कुल 18 संस्थान हुड़कों भिलाई और दुर्ग में अनवरत शिक्षा की रोशनी प्रदान कर रहे हैं. इन संस्थानों में बाल विद्यालय से लेकर उच्च से उच्चतम शिक्षा की व्यवस्था की गई है.जहां आज इंजीनियरिंग, संस्कृत, संगीत, चिकित्सा, कला मैनेजमेंट सहित हर विधा की उच्चतम शिक्षा प्रदान किया जा रहा हैं. अगर सभी संस्थाओं के छात्र-छात्राओं की गणना की जाए तो 15 से 20000 विद्यार्थी हर वर्ष इन संस्थाओं से शिक्षा हासिल कर अपना भविष्य उज्वल कर रहें हैं.1942 में रीवा के एक छोटे से गांव देवरा में जन्म लेने वाले मिश्रा जी ने अपनी इंजीनियरिंग की शिक्षा आईआईटी रायपुर जैसे उच्च संस्थानों से हासिल की और मात्र 23 साल की उम्र में भिलाई स्टील प्लांट में बतौर इंजीनियर अपने करियर की शुरुआत की इस दौरान उन्होंने बड़े-बड़े संस्थाओं के साथ अनेक परियोजनाओं पर कार्य किया. नॉर्वे कनाडा अमेरिका जैसे कई बड़ी कंपनियों को उन्हें समझाने का मौका मिला.वह शिक्षा की ताकत को अच्छी तरह समझते थे, इसलिए अपने करियर की समाप्ति के पहले वह एक बड़ी योजना की शुरुआत करना चाहते थे. जब मैंने उनसे पूछा कि आपने शिक्षा को ही समाज सेवा और व्यवसाय के रूप में क्यों चुना? तब उन्होंने कहा कि शिक्षा मेरे लिए व्यवसाय नहीं है. उन्होंने बताया कि 30 साल पहले जब मैंने अपने आसपास और छत्तीसगढ़ की स्थिति को देखा कि इन बीहड़ और उजाड़ स्थानों से बच्चे शिक्षा हासिल करने के लिए मध्य प्रदेश महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश की तरफ पलायन कर रहे हैं,लड़कियां उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए या तो संघर्ष करती थी या मध्य में पढ़ाई छोड़ देती थी. तब मुझे एहसास हुआ कि मुझे और कोई व्यवसाय नहीं करना बल्कि शिक्षा कों उन्नत करने का प्रयास करना है. और इस प्रकार वें शिक्षा की रोशनी का प्रकाश फैलाने में जुट गए. आज उनके सभी संस्थाओं में लड़कियों के रहने और पढ़ने की उच्चतम व्यवस्था की गई हैं. जहां सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं,आवास एवं खेल -कूद सहित हर तरह की ज्ञानवर्धक व्यवस्था की गई है. इन संस्थानों में भौगोलिकरण तथा व्यावसायिक स्थिति को देखते हुए पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं. जहां से विद्यार्थी शिक्षा हासिल करने के बाद देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अच्छी नौकरी हासिल करता है और अपने सपने पूरे कर रहा है.
यह तो कहानी का पहला हिस्सा था. मिश्रा जी द्वारा स्थापित किए गए इन संस्थाओं के आसपास उजड़े हुए बस्ती और शहर थे. जब मैं यहां के लोगों से मिला तो वह खुद कहते हैं कि अगर यह संस्थान यह कॉलेज यह अस्पताल नहीं होते तो शायद ही यह शहर बस पाता. आज इन संस्थाओं के आसपास अनेकों व्यवसायिक मॉल, दुकान, फल -सब्जी की मंडिया लग रही है जो की अप्रत्यक्ष रूप से इन्ही संस्थाओं की वजह से जुड़ी हुई है. इस तरह अगर हम देखें तो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से इनकी ही वजह से दस से बीस हजार लोगों के घर के चूल्हे चल रहे हैं. व्यवसाय तो इंसान हर तरह का कर सकता है,परंतु एक ऐसा व्यवसाय जिससे लोकहित भी हो समाज और देश का विकास भी तों निश्चय ही वह व्यवसाय,व्यवसाय नहीं होता बल्कि समाज का एक बहुत बड़ा समाज सुधारक का हिस्सा बन जाता है. और यह कार्य करने में निश्चित ही तौर पर मैं कह सकता हूं कि इंद्रजीत प्रसाद मिश्रा एक सफल समाज सेवी हैं.
समाज और शिक्षा के प्रति उनकी लगन तो देखना हो तो हमें विगत दस सालों में उनके जीवन में होने वाली घटनाओं से उनकों समझ सकते हैं. इस बीच उनके इकलौते पुत्र अभिषेक मिश्रा की हत्या, उनकी पत्नी की मृत्यु और उसके पश्चात् कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से भी लड़ते रहने के बावजूद शिक्षा के प्रति उनके साहस को कोई तोड़ नहीं सका. यह ऐसी घटनाएं थी जिसे विशाल से विशाल व्यक्ति भी टूट जाता है. परंतु आईपी मिश्रा वह विशाल वृक्ष है जिसने आज हजारों घरों को रोशनी से भरने का कार्य किया है.फिर ऐसे व्यक्ति कों संसार की बड़ी से बड़ी घटना भला कैसे तोड़ सकती हैं.मैंने उनकी आंखों में एक अजब सी शून्यता देखी है. यह शून्यता उन्हीं की आंखों में होती है जो दुख और सुख, इच्छा और जीवन की संतुष्टि से बहुत ऊपर उठ चुके होते हैं. गीता में ऐसे ही व्यक्ति के लिए योगी कहा गया है. जो ऐसे विशाल योग की तरफ बढ़ रहा है जहां मनुष्य साधारण मनुष्य से असाधारण मनुष्य में परिवर्तित हो जाता है और मुनि कहलाता है.
इस 85 वर्षीय शिक्षाविद की आंखें कब बंद हो जाएंगी हमें नहीं पता. अच्छा हो यदि सरकार उनकी खुली आंखे रहते उन्हें कोई राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान कर दे तो यकीन मानिए यह एक शिक्षाविद का ही नहीं बल्कि हर शिक्षक और शिक्षा का सम्मान होगा.