दो वर्ष से लगातार चलती आ रही हिंसा, आगजनी हत्या बलात्कार के बाद माननीय प्रधानमंत्री जी ने हाल ही में मणिपुर का दौरा कर वहां शांति बनाए रखने की अपील की हैं और लोगों को भरोसा दिलाया कि अब सब कुछ ठीक हो जाएगा। इन दो सालों में मणिपुर में वह सब कुछ हुआ जो इतिहास में कभी भुला नहीं जाएगा। सड़कों पर जिंदा जलती लाशें, निर्वस्त्र घुमाई गई स्त्रियां, विस्थापन का दंस झेल रहे लोग, जिसका दर्द भूलने में कई पीढ़ियां लग जाएंगी। आखिर इस हिंसा के पीछे वजह क्या थी? छत्तीसगढ़ में एक साल से हजारों एकड़ में फैले हसदेव जंगल को व्यापार के नाम पर काटे जाने का सिलसिला अभी जारी है जिसका वहां के आदिवासी घोर विरोध कर रहे है। इधर बिहार में चुनाव है वहां भी हजारों एकड़ भूमि हड़पने का मामला सामना आ रहा है । कांग्रेस का कहना है कि सरकार ने अपने व्यापारी भाई गौतम अडानी को 1051 एकड़ जमीन एक रूपये की दर से पट्टे पर दे दी हैं । अगर यह सच है तो फिर आप मणिपुर की तरह एक और हिंसा के लिए तैयार रहिए । आज देश के वंचित वर्ग का बड़ा तबका भूमिहीन है उसके पास पैर फ़ैलाने के लिए भी जगह नही है और आप यू ही किसी को खैरात नहीं बाट सकते ।
हम जानते हैं मैतेई समुदाय (राज्य की आबादी का लगभग 53%) लंबे समय से अनुसूचित जनजाति का दर्जा मांग रहा था, ताकि उन्हें सरकारी नौकरियों, शिक्षा में आरक्षण और पहाड़ी क्षेत्रों में भूमि स्वामित्व का अधिकार मिल सके। वे दावा करते हैं कि 1949 में मणिपुर के भारत में विलय से पहले वे जनजाति ही थे । 14 अप्रैल 2023 को मणिपुर हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को मैतेई को अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल करने की 10 साल पुरानी सिफारिश को केंद्र सरकार के पास भेजने का निर्देश दिया। कुकी-जो और अन्य आदिवासी समुदायों (जैसे नागा) को डर था कि इससे उनके मौजूदा आरक्षण और पहाड़ी क्षेत्रों पर नियंत्रण कम हो जाएगा, क्योंकि मैतेई पहले से ही घाटी में आर्थिक रूप से मजबूत हैं । मणिपुर का केवल 10% क्षेत्र (इम्फाल घाटी) मैतेई जातियों का है, जबकि 90% पहाड़ी इलाके कुकी आदिवासियों के पास हैं । मैतेई भूमि कानूनों के कारण पहाड़ों में जमीन नहीं खरीद सकते, जिससे वे 'हाशिए पर' महसूस करते हैं । आदिवासी इसे मैतेई समाज का विस्तारवाद मानते हैं । तो असली बात जो निकल के आ रही है वह मामला है जमीन का जिसके लिए दो जातियां लड़ मर रही हैं ।
आज उत्तर प्रदेश की आबादी देश में सबसे घनी आबादी है । 2011 की जनगणना गणना के अनुसार जहां देश में प्रति वर्ग किलोमीटर 382 व्यक्ति थे वही उत्तर प्रदेश में प्रति वर्ग किलोमीटर 829 थे । हालांकि यह एक दशक पुराना आंकड़ा है तो आप समझ सकते हैं कि आज स्थिति कितनी विकराल है । उत्तर प्रदेश की गरीब बस्तियों में कभी झांककर देखिए आठ गुणे आठ के कमरे में पूरा परिवार जी रहा है । यह स्थिति तब है जब 1958 में उत्तर प्रदेश में चकबंदी कानून के तहत अनुसूचित जातियों को कुछ जमीने मुहैया कराई गई थी । देश में हर वर्ष जितनी हिंसक घटनाएं होती हैं उनमें 25% भूमि विवादों से जुड़े मामले होते हैं, जिनमें से 30% भूमि अधिग्रहण से संबंधित हैं । एक भूमि विवाद का समाधान होने में औसतन 20 वर्ष लग जाते है । राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार उत्तर प्रदेश में 2017-2021 के बीच 3,021 हत्याएं भूमि और संपत्ति विवादों के कारण हुईं हैं । इस दौरान बिहार में 3,336 मामले दर्ज हुए और यह पूरे देश में भूमि विवादों से जुड़े अपराधों में शीर्ष पर है ।
आज शहरों , नगरों की गलियों में मनुष्य कीड़े की तरह रेंगते हुए फुटपाथ पर दिखाई देते है । हम कहते हैं की गांव में बहुत सुकून और शांति है कभी गांव की दलित, वंचित बस्तियों में झांक कर देखिए लोगों के पास पैर फैलाने की भी जमीन नहीं हैं । एक अति सामान्य जीवन जीने के लिए कम से कम एक रसोई ,एक शौचालय ,एक अध्ययन कक्ष और एक विश्राम कक्ष तथा छोटा सा बरामदा तो होना ही चाहिए पर दुर्भाग्य कि हमारे देश में करोड़ों लोग इसके लिए भी सपना देखते –देखते मर जाते है । सोच के देखिए इन परिवार में जन्मे बच्चों की परवरिश करने में ऐसे परिवार को कितने मुश्किलों का सामना करना पड़ता है । भूमि का क़ानूनी प्रक्रिया में भी बहुत बड़ा योगदान है मसलन जब कोई फौजदारी हो जाती है तब जमानत ए तौर पर यह बहुत कारगार होता है ,कुछ लोग इसके ही दम पर ग्रामीण परिवेश में समाज में दबंगई करते रहते है ।
हमने यह कैसा समाज बनाया है कहीं एक आदमी एक एकड़ में अकेले टांग फैलाए हुए हैं तो कहीं पूरा का पूरा परिवार पशुओं के जैसे दरबों में जी रहा है । मुंबई का धारावी झुग्गी भारतीय समाज का सबसे घिनौना सच हैं । हमने लोगों का पेट भरने के लिए भोजन का अधिकार बनाया (Right to food) हर बच्चे को शिक्षित बनाने के लिए शिक्षा का अधिकार बनाया (Right to education) और लोकतंत्र की रक्षा के लिए सूचना के अधिकार का कानून भी बनाया है (Right to information) अतः अब समय की मांग है की सरकार भूमि के अधिकार (Right To Land ) का भी कानून बनाए । मई 2024 में जनसत्ता में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी जिसके अनुसार देश का लगभग 90 % सम्पत्ति (भूमि जिसमे महत्वपूर्ण हिस्सा है ) 10 % लोगो के पास है ।इसका अर्थ यह हुआ कि 90 रोटी दस लोग खा रहे है और 90 लोग दस रोटी पर निर्भर है । यूनिसेफ के अनुसार भारत में आज प्रतिदिन लगभग 67385 बच्चे जन्म ले रहे है । आखिर इन आने वाले बच्चों के भविष्य के लिए हमारे पास क्या योजनाए है ? सांसारिक सत्य ये है कि हमारी भूमि तो बढ़ने वाली है नहीं और मनुष्य को सुकून से सोने के लिए कुछ फिट जमीन तो चाहिए ही अगर हमारी व्यवस्था यह सुनिश्चित नहीं कर सकती तो इसका दुर्गामी परिणाम हमें भुगतना होगा ।
इसलिए अब समय आ गया है कि सरकार यह तय करें की कितनी जमीन पर सड़के होंगी , कितनी जमीन पर तालाब होंगे , कितनी जमीन के लिए जंगल पार्क होंगे, कितनी जमीन के लिए नदियां –नाले होंगे और कितनी जमीन मनुष्य के आवास के लिए होंगी तथा कितनी जमीन उनकी खेती- किसानी के लिए होगी और कितनी जमीन स्वास्थ्य एवं खेलकूद के लिए होंगी । कहाँ हमें उद्योग लगाना चाहिए कहाँ ,कालोनी बनेगी सब कुछ तय करना होगा । क्योंकि अगर आज इस विषय पर हमने विचार नहीं किया तो हमारी बढ़ती आबादी को कोई रोक नहीं सकता और जमीन किसी भी सुरत में बढ़ने वाली नहीं है । इसलिए बेहतर होगी सब कुछ तय किया जाए और मनुष्य को एक सामान्य जीवन यापन के लिए उसके हिस्से की भूमि उसे देने की व्यवस्था हो तभी रोटी कपडा और मकान का हमारा नारा सफल हो पाएगा अन्यथा बढ़ती आबादी के साथ बढ़ती हुई हिंसा को कोई भी सरकार और कोई भी व्यवस्था रोक नहीं पाएगी ।