(स्वतंत्रता दिवस विशेष लेख )
हमारे लोकतंत्र को आठ दशक होने को है, इसलिए इसे आठ दशक तक जीवित रखने के लिए उन सभी लोकतांत्रिक नायकों को बधाई जिन्होंने अपने कलम, अपने विचार अपने क्रांति के जरिए इसे अब तक सुरक्षित रखा है.आठ दशक का मतलब होता है एक व्यक्ति का चार पीढ़ीयों से गुजर जाना.इन आठ दशक में लोकतंत्र पर कई बार कमजोर होने के चिन्ह लगे तो कई बहादुरी के क्षण भी हमने देखें .इनमें हमने एक घोषित आपातकाल भी देखा और अब एक अघोषित आपातकाल भी देख रहे हैं. लेकिन इस महान लोकतंत्र के समक्ष यक्ष प्रश्न आज भी एक ही है. क्या देश के सभी नागरिकों के साथ सरकार और सत्ता एक जैसा व्यवहार कर रही है? क्या हमारी सरकार सभी को एक समान अवसर प्रदान करने की व्यवस्था कर पाई है? जिस अंतिम पंक्ति की बात महात्मा गांधी करते थे क्या उन तक आज भी हम न्याय और सुरक्षा पहुंचा पाए हैं? कभी – कभी ऐसा नहीं लगता कि जहाँ से हमने शुरुआत की थी आज भी हम उसी के इर्द –गिर्द खड़े है (सामाजिक परिस्थिति के परिप्रेक्ष्य में ).
देश को आजाद कराने के लिए हमारे जिन क्रांतिकारीयों नें अपनी जवानी और अपनी जिंदगी इस देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते कुर्बान कर दी, उस मुल्क को हम उनके आदर्शों के कितने आसपास तक पहुंचा पाए हैं? भगत सिंह,चंद्रशेखर आजाद,सुभाष चंद्र बोस, बिस्मिल खान सभी अलग-अलग समुदाय जाति और धर्म से थे. सभी अच्छे परिवार से थे फिर ऐसा क्या जुनून उनके सर पर था जो उन्होंने अपनी ठीक-ठाक जिंदगी को इस मुल्क के नाम कर दिया, अंग्रेजों की कठोर से कठोर यातनाए सही, पूरी जिंदगी देश के लिए संघर्ष किया और तमाम जुल्म सहने के बावजूद भी हंसते-हंसते अपना जीवन इस देश के नाम न्योछावर कर दी. हमारी आस्था के अनुसार अगर आज कहीं वें स्वर्ग में होंगे और हमें देखते होंगे तो क्या हमसे खुश होंगे? यह सवाल आज देश के उन कर्णधारों के सामने है जिनके कंधों पर इन शहीदों के सपने हैं.
हमारे जितने भी क्रांतिकारी महानायक थे उन सभी ने कभी भी इस देश की कल्पना एक धार्मिक या पारलौकिक दृष्टि से होने वाले विकास की नजर से नहीं देखा. धर्म और आस्था कभी भी उनके जीवन और राष्ट्र के सपने का आधार नहीं था. उन सभी का सपना था एक ऐसा मुल्क जहां गरीब किसान अपने फसल का मालिक हो, छात्रों को पढ़ने लिखने की सारी सुविधाएं उपलब्ध हो, युवाओं को अच्छा रोजगार प्राप्त हो, महिलाएं देश में हर तरफ सुरक्षित हो, सभी को समय पर न्याय मिल सके. लेकिन उनके इस महान राष्ट्र में कहीं भी धार्मिक राष्ट्र के संकल्पना नहीं थी. ऐसा नहीं था की उनकी किसी परलौकिक शक्ति पर आस्था नहीं थी सिवाय भगत सिंह कों छोड़कर... पर वें इसे राष्ट्र के विकास से कतई नहीं जोड़ते थे.
लेकिन आज हमारे देश की पूरी राजनीति धर्म की इसी धूरी पर घूम रही हैं. जब से केंद्र की सत्ता में भारतीय जनता पार्टी की सरकार हैं उसने देश की राजनीतिक चर्चा को ही बदल कर रख दी हैं. उनके भाषणों में धार्मिक किस्से होते हैं, उनकी योजनाओं में धार्मिक चर्चाए होती हैं. वें खुलकर इस देश को धार्मिक बनाने में उन्मादे हुए हैं. मैं उनके हिम्मत की दाद देता हूं कि उन्होंने अपनी राजनीतिक विचारधारा के साथ अन्य पार्टियों को भी अपने विचारधारा बदलने के लिए मजबूर कर दिया है. अरविंद केजरीवाल इस देश में अच्छी शिक्षा देने और भ्रष्टाचार मुक्त भारत की संकल्पना लेकर राजनीति में आए थे और हनुमान चालीसा करवाने लगे. चुनाव से पहले अगर राहुल गांधी बड़े मंदिरों में ना दिखे तो उन पर हिंदू न होने का खतरा दिखने लगता है( मीडिया इस हिसाब से प्रोपगंडा रचती हैं ). जब की राहुल गांधी के वेशभूषा और बातचीत के तरीके से मालूम होता है कि उनका धर्म में कोई ज्यादा विश्वास नहीं हैं पर राजनीति की विवशता यह है कि उन्हें इसका प्रपंच रचना पड़ता है. डॉ.अंबेडकर के नाम पर राजनीति करने वाले अन्य राजनीतिक पार्टियां भी खुलकर धर्म के नाम पर होने वाले पाखंड का विरोध नहीं कर पाती और सत्ता में आने के बावजूद धार्मिक मेलों का आयोजन करती है.
आज अगर देश में कोई नेता है जो धर्म पर खुलकर बोलता है तो वह एम के स्टालिन है जो राज्य के विकास के लिए धर्म को बिल्कुल भी उपयोगी नहीं मानते(संविधान के धर्मनिरपेक्ष भावना के अनुसार ) उन्होंने स्कूल और कॉलेज में धार्मिक आधार पर होने वाले किसी भी आयोजनों पर पूर्ण तरह से पाबंदी लगा रही है. और दूसरे उभरते हुए नेता जो खुद को नास्तिक कहते हैं वह नगीना के सांसद चंद्रशेखर आजाद हैं. जो अपनी जनसभा में खुलकर लोगों को पाखंड और अंधविश्वास से दूर रहकर शिक्षा हासिल करने की बात कहते हैं.वही आप हिंदी पट्टी के राज्यों में देखिए तो विगत कुछ वर्षों में स्कूल और कॉलेज में इतने धार्मिक आयोजन किये जा रहे हैं जिसका कोई हिसाब नहीं. धर्म की राजनीति इस कदर आज मुल्क पर हावी हो चुकी है कि इसमें बलात्कार जैसे अपराध भी भी दब कर रह जा रही है, शिक्षक और शिक्षा दोनों दम तोड़ रहे, युवा बेरोजगार घूम रहें हैं, न्याय मांगने वालों के साथ दूर-दूर तक कोई खड़ा नहीं दिखाई दे रहा. ऐसी परिस्थिति में अदम गोंडवी नें बहुत ही खूबसूरत बात कही है कि-
ये अमीरों से हमारी फ़ैसलाकुन जंग थी
फिर कहाँ से बीच में मस्जिद -मंदिर आ गए.
आज सरकार के खिलाफ बोलना “धर्म” के खिलाफ बोलने के बराबर हो चूका है,जबकि इन नेताओं का धर्म से कोई नाता नही होता,और होना भी नहीं चाहिए .आज देश में धार्मिक आयोजनों को हमारे नेताओं ने देश की सभी समस्याओं से जरुरी बना दिया है . एक आयोजन ख़त्म नही हो रहा कि दूसरे की तैयारी होने लगती है .मीडिया के सभी उपकरणों के माध्यम से इतना बड़ा धार्मिक हंगामा खड़ा किया जा रहा है जिसमे आम नागरिक “विवेकहीन” होकर सुध – बुध खो चुकी है . आस्था राजनीति ,मनोरंजन और व्यवसाय का स्वरुप ले चुकी है जिसका लाभ राजनीतिज्ञ लोग बड़े चतुराई से उठा रहे है . इसलिए अब भारत को एक नाष्तिक (धर्मनिरपेक्ष ) शासक ही सही मायने में लोकतांत्रिक बना सकता है जहाँ सबको तर्क करने का अधिकार होगा ,धर्म निजी जीवन तक ही सीमित रहेगा और समय पर सबको न्याय मिल सकेगा .