भारत के हजारों वर्ष के इतिहास में भगत सिंह जैसा मातृभूमि से प्रेम करने वाला, देश के लिए निर्भीक होकर मरने वाला, दूरदर्शी, सहनशील,युवा नेतृत्वकर्ता नायक दूसरा कोई नहीं हैं. एक संभ्रान्त परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने अपने लिए कांटों की राह चुनी. देशप्रेम का एक दौर ऐसा भी आया जब 60 वर्ष के विश्व ख्याति प्राप्त कर चुके महात्मा गांधी से भी ज्यादा देश में भगत सिंह कि चर्चाए होने लगी थी. देश के युवा गांधी की जगह भगत सिंह को अपना नायक मानने लगे थे. भारत के क्रांतिकारी इतिहास में 116 दिन तक ( क्रूर यातना के साथ ) भूख हड़ताल कर अंग्रेजो कों भी रुला देने वाले भगत सिंह का अपने आप में एक मर्मात्मक इतिहास हैं.
आखिर इस 23 साल के सुन्दर, सुडौल नौजवान की ऐसी क्या जरूरत थी, उसने अपने सुंदर जीवन का एक भयानक अंत क्यों चुना?
आज जब हमारे देश के युवा अपने ही आजाद मुल्क में अपना भविष्य नहीं बचा पा रहे हैं. अपना कैरियर नहीं चुन पा रहे हैं. दिशाहीन होकर राजनेताओं के बहकावे में आकर सही और गलत का फैसला नहीं ले पा रहा है तों ऐसी स्थिति में वाजिब है कि वह भगत सिंह को अपना नायक माने और उनके मार्गदर्शन में देश और स्वयं के लिए एक नई रोशनी की तलाश करें. आज देश की आबादी 60% युवाओं की ऊर्जा से भरा हुआ हैं, पर यह ऊर्जा ज्यादा समय तक टिकने वाला नहीं. लेकिन भारत का दुर्भाग्य देखिए के युवा आज अपने भविष्य की की तलाश में खोए हुए हैं. इसका कारण यह है कि यह युवा गलत नायकों के पीछे चल रहे हैं. पुस्तकों से दूर है और सोशल मीडिया को ही अपनी किताब और दुनिया मान रहे हैं. भारत के शिक्षा की दशा कभी भी उन्नत नहीं रही है और इधर कुछ दशकों से राजनेताओं ने तो उन्हें और दिशाहीन कर दिया है तिस पर यह सोशल मीडिया उनके सोचने और समझने की शक्ति को भी खा रहा है. अच्छी डिग्री हासिल करने के बाद यदि उसे रोजगार हासिल नहीं हो रही तो वह सोशल मीडिया पर उल्टे फूलटे कारनामे करके अपने जीवन को बचाने की कोशिश करने लगता है. वह समझ नहीं पा रहा कि उसने जीवन में क्या गलती की है जिसकी उसे सजा मिल रही है.
आज चारों तरफ वोट चोरी और मतदान चोरी की बातें देखने को मिल रही हैं. संविधान बचाने की मुहिम चलाई जा रही है. बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर के युवा बेरोजगार घूम रहे हैं, आखिर क्यों? क्योंकि उन्होंने गलत नायक चुना है, उन्होंने गलत नेता चुना है. ऐसा नेता जो आपको धर्मांध बनाएं, पाखंड बेचने वाले बाबाओं के कसीदे पढ़े. 24 घंटे जनमाध्यमों के जरिए आपके भाईचारा को तोड़ने की कोशिश करें. जाति, धर्म, क्षेत्र के नाम पर आप में हिंसा भरे और आपकी भीड़ को अपनी ताकत बनाकर स्वयं सत्ता हासिल करें ऐसे राजनेताओं से, साधु, महात्मा,मौलियों से जब तक आप दूरी नहीं बनाएंगे, तब तक आप और यह देश दोनों अंधकार में ही डूबा रहेगा.
आज 18 साल से 22 साल की युवा जिनकी उम्र उच्च शिक्षा और अच्छी शिक्षा हासिल करने की होती है. वे सुबह शाम मंदिरों के चक्कर लगा रहे हैं, पांच वक्त का नमाज अदा कर रहे हैं. धर्म बचाने के नाम पर एक दूसरे पर पत्थर चला रहे हैं तो उनके लिए बहुत जरूरी है कि वह भगत सिंह को पढ़े और समझे कि उस नवयुवक इस देश के लिए आपके लिए इतनी यातनाएं क्यों झेली.
आज जिन तीन महत्वपूर्ण समस्याओं से भारत जूझ रहा है उन समस्याओं पर भगत सिंह के विचार बहुत स्पष्ट थे. यह तीन समस्याएं हैं युवा शिक्षा, धर्म और सत्ता. युवाओं के लिए उनके विचार था कि जिस देश का युवा मंदिर मस्जिद जाने की वजाय स्कूल और कॉलेज में अपना समय व्यतीत करेगा तो देश का भविष्य अपने आप ही उज्जवल रहेगा. धर्म को लेकर वह बिल्कुल ही असहमत थे उनका मानना था की मनुष्य का भाग्य उसके हाथों में लिखा है उसे अपने परिश्रम पर यकीन रखना चाहिए. और सत्ता के लिए उनका स्पष्ट कहना था कि देश में ऐसा शासक होना चाहिए जो गरीब, किसान, बेरोजगार,महिलाओं, के हित के लिए काम करने वाली हो. परंतु आज हमारी समस्या है कि हम इन तीनों समस्याओं से घिरे हुए हैं. आज जातीयता के दम्भ में जीने वाले हमारे युवा क्या यह जानते हैं की भगत सिंह अपने पखाना साफ करने वाले 'बोघा' कर्मचारी कों मां कहते थे?इन मुद्दों पर अगर आप बात करेंगे तो आप नास्तिक कहलाएंगे आपको देश प्रेमी नहीं माना जाएगा. सोच के देखिए अगर आज भगत सिंह जिंदा होते तो क्या हमारे नेता उन्हें खुलेआम अपने विचार युवाओं के बीच रखने देते? तो फिर क्या फर्क हुआ गुलाम और आजाद भारत में. उन्होंने साफ कहा था कि हमें ऐसे आजादी बिल्कुल नहीं चाहिए जो गोरों के हाथ से छीन कर काले अंग्रेजों के हाथ में पहुंच जाए. और उनकी यह बात आज सही साबित हो रही है. आज गांधी हमारे नायक है, अंबेडकर हमारे नायक है, सरदार पटेल हमारे नायक हैं, पर भगत सिंह क्यों नहीं?
डॉ संजीव कुमार