इक्कीस जुलाई को भीम आर्मी पटना में अपना दसवां स्थापना दिवस मना रही है. इधर कुछ सालों में भीम आर्मी पूर्वी -उत्तर भारत और मध्य भारत मैं अपना पहचान बनाने में सफल हुई है. आज इसे एक बड़े सामाजिक क्रांतिकारी संगठन के रूप में देखा जा रहा है. एक ऐसा संगठन जो दलितों,शोषितों और महिलाओं पर हुए हमले को लेकर तुरंत अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करती है. आज जब भी किसी दलित -वंचित पर हमला होता है तो वह सबसे पहले भीम आर्मी की तरफ देखता हैं. इसकी वजह शायद इसके संस्थापक चंद्रशेखर आजाद की त्वरित प्रक्रिया है. उन्हें जैसे ही ऐसी किसी घटना के विषय में सूचना प्राप्त होती है वह आधी रात को वहां पहुंचने का प्रयास करते हैं और कानून तथा सरकार से सीधे त्वरित न्याय की मांग रखते हैं. आज भीम आर्मी देश के एक दर्जन राज्यों तक फैल चुकी है. उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली,हरियाणा,और पंजाब राज्यों में इसकी पकड़ अब मजबूत होती जा रही है. आज चंद्रशेखर आजाद और भीम आर्मी की छोटी सी छोटी जनसभा में भी हजारों की भीड़ हो जाती है. आज से दस साल पहले कौन जानता था कि कुछ नवयुवकों के द्वारा संगठित एक छोटी सी मुहिम लाखों करोड़ों की आवाज़ होगी. सहारनपुर के ए एच पी कॉलेज जिससे चंद्रशेखर आजाद,विनय रतन सिंह और सतीश कुमार जुड़े थे वहां दलित छात्रों के साथ आए दिन भेदभाव का मामला बढ़ता जा रहा था, हद तो तब हो गई जब वहां दलितों के लिए पीने के पानी का अलग से नल लगवाया गया. इस दुर्व्यवहार से चंद्रशेखर के साथ अन्य युवाओं का खून खौल उठा और उन्होंने ऐसी समस्याओं का विरोध करने के लिए भीम आर्मी जैसे संस्था का गठन किया. इस संस्था के गठन के पीछे इन युवाओं का मकसद था वंचित समाज के लोगों को शिक्षा से जोड़ना, और उनके सामाजिक बहिष्कार का विरोध करना. धीरे-धीरे इसकी कार्यप्रणाली बढ़ने लगी, लोग इस विचारधारा से जुड़ने लगे. फिर चंद्रशेखर और विनय रतन ने देश के हर उस बड़े मामले के विरोध में आंदोलन की मुहिम चलानी शुरू कर दी जिससे दलितों और वंचितों का शोषण जुड़ा हुआ होता था. मसलन रोहित वेमुला हत्याकांड, दिल्ली में रविदास मंदिर का मामला, या फिर 2018 में सरकार द्वारा अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण पर भीम आर्मी का राष्ट्रीय आंदोलन.पुरे देश ने देखा था इस आंदोलन में तो देश भर के दलित और सामाजिक कार्यकर्ता जरूर शामिल हुए थे लेकिन भीम आर्मी इनमें सबसे आगे नजर आ रही थी.
चंद्रशेखर आजाद और उनकी भीम आर्मी को राष्ट्रीय स्तर पर जो पहचान मिला वह सहारनपुर के शब्बीरपुर और देवबंद में हुए ठाकुरों तथा दलितों के बीच जातीय हिंसा के बाद देखने कों मिलता हैं. वही 2018 का जन आंदोलन इसमें मिल का पत्थर साबित होता है. लेकिन जब 2020 में भीम आर्मी अपनी राजनीतिक पार्टी का गठन करती है तब देश की दलित राजनीति पर कई सवाल खड़े होने शुरू हो जाते हैं. दरअसल देश में आज तक यही होता रहा है देश के वर्तमान राजनीतिक सामाजिक चिंतक जिन्होंने भी दलित, बहुजन आंदोलन को मजबूत करने का कार्य किया उन्होंने पहले सामाजिक संगठन ही बनाए और उसके बाद अपनी राजनीतिक संगठन को उसमें परिवर्तित कर दिया. 1925 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक की स्थापना हुई तब दक्षिण भारत में ई वी रामास्वामी नायकर जिन्हें आज हम पेरियार के नाम से जानते हैं के द्वारा स्वयं सम्मान आंदोलन की नींव रखी गई और इसी जनजागरण से निकलकर 1944 में डीएमके की राजनीतिक पार्टी बनी. 1972 में नामदेव ढसाल ने दलित पैंथर्स की स्थापना की इसका मुख्य उद्देश्य था दलितों पर होने वाले अत्याचार के बदले उनका वैसे ही जवाब देना (टिट फॉर टैट) जिसकी वजह से 1977 में इस पर प्रतिबिंब भी लगाया गया और बाद में हटा दिया गया. 1978 में डी के खरपड़े और कांसीराम जी के द्वारा बामसेफ की स्थापना हुई और 1981 में मान्यवर ने डी एस फोर की स्थापना की जिसे आगे चलकर 1984 में बहुजन समाज पार्टी के रूप में परिवर्तित किया गया. आज भीम आर्मी भी उन्हीं कदमों पर चल रही है. मुझे लगता है अगर वंचित,कामगार तथा दलित समाज को अपना संघर्ष लंबे समय तक जारी रखना है, उसे सत्ता में मजबूती से अपना स्थान बनाना है, अपने अधिकारों के लिए,अपनी सुरक्षा के लिए, अपने विचारों कों बचाए रखना है तो उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस )से भी सीखना चाहिए.
हम यह जानते हैं कि भीम आर्मी और इसके पूर्ववर्ती जितनी भी सामाजिक संगठन बनाए गए थे उन सब की लड़ाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा उनकी विचारधाराओं से सीधा रहा हैं. और इसे अगर स्पष्ट करें तो इस देश में सिर्फ एक ही लड़ाई है शोषित बनाम शोषक. बाकी सभी लड़ाइयां,विचारधाराएं जन आंदोलन तो सामने दिखाई देने वाली महज एक सुंदर चित्रकारी भर हैं.
1925 से कार्यरत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने 100 साल के इतिहास में अनेकों उतार-चढ़ाव देखें. 1948 में बापू की हत्या के बाद इन्हें बापू की हत्या से सम्बंधित संगठन कहकर पाबंद भी किया गया. 1975 में आपातकाल के दौरान भी ईसे सरकार द्वारा नियंत्रित रखा गया. परंतु इन सब के बावजूद भी यह संस्था ना टूटी ना कमजोर हुई. हम सब यह जानते हैं कि किसी भी संस्था को मजबूत होने, उसके विचारधारा को स्थापित होने में कम से कम एक शताब्दी का समय चाहिए होता है. अंग्रेज हमारे मुल्क में आए उन्होंने भी 100 साल से ज्यादा समय हमारे साथ व्यापार करने में ही बिताया और फिर धीरे-धीरे अपने विचारों को हमारे साथ परोसते हुए हम पर एकाधिकार हासिल कर ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी बिल्कुल इसी तरह से धीरे-धीरे लोगों को जोड़ा ,अपने विचारधारा में तब्दील किया और सत्ता की तरफ हाथ बढ़ाया, आज चारों तरफ से उनकी कामयाबी की खेती लहलहा रही है. वे सत्ता से लेकर व्यापार,प्रशासन हर जगह अपने लोगों को तवज्जो दे रहे हैं और देते आए हैं. राजनीति,प्रशासन, शिक्षा और व्यापार यह चार चीजें किसी भी राष्ट्र की धमनी होती है. जिस दिन आप इन चारों धमनियों में बहना शुरू कर देंगे पूरा शरीर अर्थात पूरा राष्ट्र आपका होगा. भीम आर्मी को भी इनसे सबक लेनी की आवश्यकता है. हालांकि राजनीतिक महत्वाकांक्षा इतना हमें सब्र नहीं दे पाती लेकिन भीम आर्मी को अपनी लड़ाई लंबी रखनी है और डॉ भीमराव अंबेडकर के कथनाअनुसार सत्ता में आना है तो उन्हें भी कोई शताब्दी वर्षों का एक सामाजिक संगठन मजबूत करना होगा. एक ऐसी सामाजिक संगठन जो उन्हें राजनीतिक बल प्रदान करें. हम जानते हैं एक राजनीतिक पार्टी की अपनी एक सीमा होती है परंतु सामाजिक और वैचारिक संस्थाएं बहुत हद तक आजाद होती है. और जब मुकाबला भीम आर्मी का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से है तो इन्हें भी अपनी विपक्षी लोगों से कुछ सीखना चाहिए. आज हम देखते हैं कि जब दलितों,मुसलमानों महिलाओं पर कोई अत्याचार होता है. जो समाज सदियों से हाशिए पर है अगर वह अपने अधिकारों की बात करता है तो उसे कुचलने का पूरा प्रयास किया जाता है. इन विचारों को कुचलने का जो कार्य होता है यह यही सामाजिक संस्थाएं करती हैं तो जाहिर सी बात है भीम आर्मी को इन संस्थाओं के जवाब के लिए आगे आना होगा और उसकी इकाई आजाद समाज पार्टी को राजनीतिक रूप से मजबूत होना होगा. आज आजाद समाज पार्टी के पास लोगों की कमी नहीं बस जरूरत है उन्हें सही दिशा दिखाने की, अब देखते हैं कि चंद्रशेखर आजाद और विनय रतन सिंह इस लड़ाई को कहां तक ले जाते हैं.
डॉ. संजीव कुमार