रसातल में भारतीय शिक्षा

 

        

   हरियाणा बोर्ड परीक्षा के परिणाम ने इस साल पुरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था. इस बार के सरकारी बोर्ड परीक्षा परिणाम में कुल 18 स्कूलों से 12वीं का एक भी छात्र सफल नहीं हुआ था पर दुर्भाग्य की इस पर देश में कहीं भी कोई बड़ी चर्चा नहीं हुई. हो भी कैसे सकती है जो देश पिछले कुछ सालों से धार्मिक उन्माद और सांप्रदायिकता में झुलस रहा हो जहां की जनता आस्था के नाम पर एक दूसरे का घर तोड़ रही हो उन्हें भला शिक्षा से क्या लेना देना.

     यह जो 18 स्कूलों के विद्यार्थी असफल  हुए हैं इनके लिए मैं इन्हें जरा सा भी दोषी नहीं ठहराऊंगा क्योंकि इसके बीज हम कई वर्षों से रोपते आ रहे हैं जिनके वृक्ष आज विशाल हो चुके हैं. भारतीय शिक्षा को हमने तीन स्तर पर बर्बाद करने का कार्य किया है पहला इसका व्यवसायीकरण करके , दूसरा युवाओं को धर्मांध बनाकर और तीसरा इन्हें स्मार्ट फोन देकर. मैं भारतीय शिक्षा को तीन हिस्सों में बांट कर देखता हूं. पहले प्राइमरी शिक्षा  (1-8तक) दूसरा माध्यमिक शिक्षा(8-12)तक और आखिरी उच्च शिक्षा.

    प्राथमिक शिक्षा किसी भी देश(बच्चे) की मजबूत बुनियाद होती है और हमने इस बुनियाद को निजी स्कूलों के हाथों में सौंप दिया है.ये निजी विद्यालय अभिभावकों से मनमानी पैसे ऐंठ रहे है पर इन्हें नियंत्रित करने का हमारे पास को उपाय नहीं है . भारत की बढ़ती आबादी के कारण जब हम अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में उच्च व्यवस्था नहीं दे पाए तब व्यवसायी और पूंजीपतियों ने बेरोजगारों के सहारे इन स्कूलों का व्यापार शुरू कर दिया. एक तरफ हमने सरकारी स्कूलों कों योजनाबद्ध तरीके से खस्ता हाल किया तो  दूसरी तरफ निजी स्कूलों को धड़ाधड़ खोलने के दरवाजे भी खोल दिए.इन निजी स्कूलों ने अपने स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था की, बच्चों के बैठने के लिए टेबल और पंखे लगवाएं उन्हें यूनिफॉर्म में सजाकर अंग्रेजी शिक्षा परोसी और वे सफल हो गए. दूसरी तरफ प्राथमिक शिक्षा में ना ही शौचालय की व्यवस्था की गई और ना ही  बच्चों के बैठने के लिए उचित व्यवस्था, यहां तक की बुनियादी जरूरतों में शामिल पीने का पानी और पंखा तक भी हम नहीं दे सके. उसके साथ लगातार इन स्कूलों में अध्यापकों की भर्ती भी हमने रोके रखा( मध्य प्रदेश में आज भी 1275 स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं है. देश में आज लगभग 11 लाख शिक्षकों की कमी है) इन्हीं सब खामियों के कारण प्राइवेट स्कूलों का व्यवसाय धड़ल्ले से विकास कर रहा है और सरकारी स्कूलों पर सरकार की गांज गिर रही है.ताज़ा मामला उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लगभग 5000 स्कूलों को बंद करने या फिर उन्हें कंपोजिट करने की घोषणा  हमारे सामने हैं .आज हमारे देश में दो तरह की शिक्षा बच्चों को दी जा रही है, एक तरफ है प्राइवेट के वें स्कूल जिसमें 10% ही ऐसे स्कूल है जहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है और 90% ऐसे स्कूल है जो अंग्रेजी के नाम पर लोगों की जेब काट रहे हैं. दूसरी तरह वह सरकारी विद्यालय है जहाँ दलित बच्चों को आज भी अछूत समझा जाता है ,उन्हें अलग पंक्ति में बैठाया जाता है . इन विद्यालयों में शिक्षकों की कमी तो एक समस्या है ही लेकिन जहाँ है भी वहां समय से बच्चों को पढ़ा नहीं रहे है . इन विद्यालयों में वैसे ही विद्यार्थोयों की संख्या बहुत कम  है फिर भी अच्छी तनख्वाह के बावजूद ये शिक्षक उन्हें उचित शिक्षा नहीं दे पा  रहे है जिसके लिए इन अध्यापकों को भी अपने गिरेबान में झांकना चाहिए .

   बात करें माध्यमिक शिक्षा की तों यह एक विद्यार्थी के जीवन की रीढ़ होती है और यह रीढ़ स्मार्टफोन , रील, डिजिटल शिक्षा,तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उलझकर कमजोर हो चुकी हैं. प्राइवेट स्कूलों के 90% वाले परिणाम ने अभिभावकों को पागल बना रखा है उन्हें लगता है कि उनका बच्चा 90% प्राप्त कर रहा है तो बहुत ही काबिल है. दरअसल इन निजी स्कूलों, कॉलेजों अथवा विश्वविद्यालयों में आज इसलिए अधिकतम अंक बच्चों को दिए जाते हैं ताकि अभिभावक प्रसन्न रहे और विद्यार्थी भी संतुष्ट रहे जिससे उनके संस्थानों में एडमिशन की कतार लगी रहे. बढती प्रतियोगिता अभिभावकों के दिलों दिमाग पर छाया हुआ है, उन्हें ऐसा लगता है कि इन विद्यालयों से निकलकर उनका बच्चा समाज में फर्राटेदार अंग्रेजी बोलेगा और कामयाब होगा परंतु सच्चाई इससे बहुत दूर है.

      रही बात उच्च शिक्षा की तों आज दुनिया के 200 विश्वविद्यालयों में भी हमारे विश्वविद्यालय का स्थान नहीं है. एकेडमिक फ्रीडम इंडेक्स 2023 के अनुसार शिक्षा के गुणवत्ता में हम रवांडा, केन्या,भूटान, पाकिस्तान और नेपाल जैसे देश के साथ खड़े हैं. यह इंडेक्स  विश्वविद्यालय में शोध की गुणवत्ता,ज्ञान प्रसार करने की आजादी,कैंपस में घुलमिलकर चर्चा की आजादी, शिक्षक की निजता  का सम्मान जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं के आधार पर बनाई जाती है. विगत एक दशक से जिस तरह से भारत के महत्वपूर्ण शिक्षा संस्थानों पर सरकार के हमले हुए हैं, वहां के शिक्षकों पर पाबंदी लगाई गई है यह किसी से छुपा नहीं. निजी विश्वविद्यालयों में तो शिक्षकों के केबिन में सीसी कैमरे तक लगाए जाते हैं जो कि उनकी निजता का अपमान है.

  दूसरी तरफ सरकार लगातार उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों के पद को रिक्त रखे हुए हैं. आज केंद्रीय विश्वविद्यालय में 18940 प्रोफेसरों के पद रिक्त है जिनमें सबसे ज्यादा अनुसूचित जातियों एवं पिछड़ी जातियों के पद है. अनुसूचित जातियों के पद एनएफएस के नाम पर रिक्त रखा जा रहा है तो पिछड़ी जातियों को उच्च शिक्षा में पहुंचने से रोकने के लिए. अगर कहीं भर्ती भी हो रही है तो उसमें भी वे लोग पहुंच रहे हैं जो सत्ता संतुलन के लोग हैं जो आए दिन फर्जी मामलों में फँसते रहते हैं. अभी ताजा मामला हरियाणा में 292 प्रोफेसर की फर्जी डिग्री और बिहार के आर्यभट्ट विश्वविद्यालय में कॉन्ट्रैक्ट पर शिक्षकों से नियुक्ति के नाम पर घूस के  मामले से आप स्थिति समझ सकते हैं. उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रवृत्ति खत्म की जा रही है, डिग्री और नियमों पर सरकार कभी भी सुनिश्चित नहीं हो पाई है. नियुक्तियां निकलती है तो भी पद स्वीकृति से लेकर नियुक्ति तक  भ्रष्टाचार में सनी हुई होती है. आज विश्वविद्यालयों में कुलपति से लेकर प्रोफेसर की नियुक्ति तक के पद खरीदे और बेचे जा रहे हैं यह  जग जाहिर है. ऐसी स्थिति में दुनिया के साथ ताल मिलाकर चलना भारत के लिए भला कैसे संभव होगा ? आज शिक्षा इतनी महंगी हो चुकी है कि एक मजदुर अपने बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा की कल्पना भी नहीं कर सकता .निजी स्कूल जोंक की तरह पैसा चूस रहे है तो सरकारी विद्यालय दीमक कीतरह  गरीबों का भविष्य चाट रहे है ,इन दो रास्तों से शिक्षा हासिल करने के बाद आखिर भारत में एकता भला कब तक साँस ले सकती है ?

डॉ.संजीव कुमार

सामाजिक एवं राजनितिक विशेषज्ञ

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