भारत ने कभी भी अपने बेसिक मूल्य की कदर ही नहीं की, शिक्षा,स्वास्थ्य,महिला सुरक्षा, बाल अपराध, बाल सुरक्षा यह कभी भी इस देश की लोकतंत्र में या फिर नैतिकता में ही नहीं रहा है.
किसी भी राष्ट्र के सबसे बड़ी संपत्ति उसकी आने वाली पीढ़ी उसके बच्चे होते हैं. परंतु हमारी सरकार ने कभी भी इन बच्चों को ध्यान में रखकर कोई ठोस कार्यक्रम या क्रांतिकारी पहल नहीं की. देश में 3.84 करोड़ बच्चें सामान्य वजन से भी कम है. लगभग एक करोड़ बच्चे कुपोषित हैं और 4.26 करोड़ बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से लंबाई में छोटे हैं ( यह आंकड़े 5 वर्ष के उम्र तक के ही बच्चों का है जो भारत में लगभग 12 करोड़ के आसपास हैं ) यानी भारत का बुनियाद ही कुपोषण की कमी से हो रही है. जाहिर सी बात है यह बच्चे उन घरों के तो नहीं होंगे जहां दौलतों के ढेर लगे होंगे. यह स्थिति तब है जब सरकार द्वारा इन बच्चों के लिए पौष्टिक आहार का वितरण भी किया जा रहा है. लेकिन इन पौष्टिक आहार में कितनी पौष्टिकता होती है आप सब यह जानते हैं. तो फिर यह बच्चे जब अपनी बचपना से बाहर निकलते हैं तो उनके सामने अपना पेट भरने का सवाल खड़ा हो जाता है. और ऐसी स्थिति में यह बच्चे बाल श्रम की तरफ धीरे-धीरे खिसकने लगते हैं, जहां इनका छोटे दुकानों पर, होटलों पर, ईंट भट्ठे एवं कालीन तथा साड़ी एवं दरी की बुनाई में हर तरह से शोषण किया जाता है. इनका शोषण इतना आसान होता है की इन्हें इनका अंदाजा भी नहीं होता क्योंकि इन स्थानों पर इन्हें दो वक्त की रोटी और फटे कपड़ों के लिए अपना बचपना दाव पर लगाना पड़ता है.
आप सब ने देखा होगा हमारे देश में बाल श्रम अपराध तो है लेकिन यह अपराध थानों के सामने, कचहरी के सामने भी बड़े ही आसानी से किया जाता है और किसी का हृदय इनके लिए नहीं पसीजता. कॉविड -19 से पहले देश में एक करोड़ बच्चे बाल मजदूर थे लेकिन इस महामारी ने यह संख्या आठ गुना कर दी हैं. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार आज भी भारत में लगभग 5 करोड़ बच्चे श्रमिक है, और इन्हें इस जाल से निकालने के लिए हमारा शिक्षा का अधिकार कानून भी कारगर साबित नहीं हो रहा हैं.
डॉ. संजीव कुमार
सामाजिक एवं राजनीतिक विशेषज्ञ