अपमान, पहचान, ज़िद्द की कहानी है "पेद्दी"

(पोस्टर सोशल मीडिया साभार )
आपकी नियत सही हो तो कमाई के साथ-साथ आप समाज का भी उद्धार कर सकते हैं यह इसके निर्देशक ने कर दिखाया हैं . इधर कुछ वर्षों से लगातार प्रोपगंडा फिल्मों की भरमार की वजह से सिनेमा हॉल का टिकट कटाने से पहले 10 बार सोचना पड़ता है. परंतु पेद्दी फिल्म आपको निराश नहीं करती.
 इसके निर्देशक बुचि सना ने सामाजिक मुद्दों को बहुत मजबूती से निर्देशित करके समाज के सामने प्रस्तुत करने का बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो कि आजकल कम दिखाई दे रहा है. 
 फिल्म का ट्रेलर जिस तरह से दिखाया जा रहा था उससे लग रहा था कि यह एक हिंसात्मक और बदले की कहानी होगी. और मैं समझता हूं कि जिस तरह के कमर्शियल फिल्मों का यह दौर चल रहा है अगर उसमें फिल्म की मूल भावना का जरा भी जिक्र हो पाता तो शायद यह फिल्म नहीं चल पाती. क्योंकि यह फिल्म कमर्शियल नहीं सोशल है. मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि आजकल सोशल फिल्में बहुत कम बन रही है. और बन भी रही है तो कमर्शियल तथा हिंसात्मक फिल्मों के आगे बुरी तरह बाजार में पिट जा रही है, इसलिए सोशल फिल्में बनाने का क्रेज़ धीरे धीरे खत्म होता जा रहा है. शायद यही वजह है कि इसके निर्देशक बुचि बाबू ने बड़ी चतुराई से सिनेमा हॉल तक जनता को खींचने के लिए इसे कमर्शियल फिल्मों की तरह ही प्रचारित किया.
 फिल्म की कहानी की बात करें तो फिल्म ऐसे गांव की कहानी है जिसका समाज में कोई नाम पहचान नहीं है. इस नाम पहचान की वजह से गांव के लोगों को कितना तकलीफ उठाना पड़ता है, किस तरह से समाज से अछूत बनकर जीना पड़ता है यह फिल्म में अच्छी तरह दिखाया गया है. फिर उसका नायक पेद्दी अपनी ज़िद्द और अपने खेल के दम पर किस तरह अपने गांव को पहचान दिलाता है यह देखने लायक है. पेद्दी के रूप में रामचरण की भूमिका शानदार हैं, और सबसे जान डालने वाली फिल्म में हैं तो वह हैं ए आर रहमान की म्यूजिक. अगर आपको सामाजिक फिल्में पसंद नहीं है तो बिल्कुल यह फ़िल्म न देखें. मेरी तरफ से फ़िल्म को 10 में से 8 अंक.

Post a Comment

Previous Post Next Post