ग्वालियर में भीम आर्मी और चंद्रशेखर आज़ाद का जनशैलाब पूरा देश और दुनिया देख रहीहै. ग्वालियर हाई कोर्ट में कुछ संकुचित मानसिकता के लोगों की वजह से बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा स्थापित नहीं हो पाई थी. यह बात भीम आर्मी और आजाद समाज पार्टी भला कैसे बर्दाश्त कर सकती थी. आज देश में अगर कहीं भी बाबा साहब की प्रतिमा को कोई किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाता है तो इसकी सूचना सबसे पहले चंद्रशेखर आजाद को प्राप्त होती है, आज उनका नेटवर्क कितना बड़ा हो चुका है इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है. चंद्रशेखर के तेवर में, शब्दों में वही आग है जो बाबा साहब के तेवर गोलमेज सम्मेलन और उनके भाषणों में है. बहुत वर्षों से दलित समाज को ऐसे ही नेता की प्रतीक्षा थी.
विगत एक दशक से भी ज्यादा समय से उत्तर प्रदेश में बसपा सुप्रीमो मायावती की राजनीतिक पार्टी के नैपथ्य में जाने से से दलितों की राजनीति लगातार शून्य होती जा रही थी. देश की दलित राजनीति जैसे अनाथ हो चुकी थी और सभी राजनीतिक पार्टियां इस वोट को भुनाने के लिए अंबेडकर को अपना नायक घोषित करने में लगी हुई थी भले ही उनके राजनीतिक चरित्र में अंबेडकर कहीं फिट न होते हो. देशभर में दलितों पर हमले और अपमान का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा था और ऐसी स्थिति में 21 जुलाई 2015 में चंद्रशेखर आजाद और विनय रतन सिंह के भीम आर्मी का उदय होता है. इस आर्मी को खड़ा करने का मुख्य उद्देश्य दलितों एवं शोषितों के अधिकारों की रक्षा करना था सहारनपुर से प्रारंभ इस आर्मी के विचारक चंद्रशेखर को तब शायद ही यह विचार आया होगा कि वह कभी राजनीति में भी आएंगे क्योंकि उन्हें पूरा उम्मीद था कि उनकी आर्मी को बहुजन समाज पार्टी सहित अनेक ऐसी राजनीतिक पार्टियां जो दलितों के हितों की बात करती हैं उनके साहस का सम्मान करेंगी और उनके आर्मी को संरक्षण प्रदान करेंगे,लेकिन हुआ इसका विपरीत उलटे इन्हें अपने ही वैचारिक पार्टियों का तिरस्कार झेलना पड़ा. भारतीय जनता पार्टी जो आज देश में सत्ता पर बैठी हुई है तो इसमें सिर्फ उस पार्टी का ही योगदान नहीं है इसके पीछे उनके घटक संगठनो का भी बहुत बड़ा योगदान है. जिम राष्ट्रीय सेवा संघ, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसी अनेक सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रणाली भी शामिल है. इन्हीं सब के जवाब में चंद्रशेखर ने भीम आर्मी जैसी संगठन का गठन किया है. यह संगठन उन गरीबों, मजदूरों,बेरोजगारों शोषितों का है जो हर घड़ी अपने जीवन में कहीं ना कहीं घूट रहे थे लेकिन आज उन्हें चंद्रशेखर आजाद में अपना गॉडफादर दिखता है.
20 मार्च 2018 को जब सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण कानून में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगाने का मसौदा बना रही थी तब भीम आर्मी ने 2 अप्रैल 2018 को भारत बंद की घोषणा की और देश भर में इस कानून के खिलाफ मोर्चा निकाला और चंद्रशेखर की अगुवाई में यह आंदोलन सफल रहा. अन्य राजनीतिक और सामाजिक संस्थाओं ने भी इस आंदोलन कों अपनी ताकत दी परंतु चंद्रशेखर के भीम आर्मी ने देश भर के दलितों को जोड़ने का बहुत बड़ा काम किया था. उसके बाद चंद्रशेखर की छवि देशभर में दलित समाज और दलितों के लिए एक गॉडफादर के रूप में देखने कों मिलती हैं. जहां-जहां दलितों पर अत्याचार होते हैं चंद्रशेखर वहां पहुंचने का पूरा प्रयास करते हैं और पीड़ित परिवार के साथ सड़क पर उतरकर न्याय की मांग करते नज़र आते हैं. दूसरी तरफ अन्य राजनीतिक पार्टियां जो दलित एवं अंबेडकरवादी राजनीति की वजह से सत्ता में मलाई खा रहे थे या फिर राजनीतिक ताकत में थे वह सिर्फ मूक बनकर तमाशा देख रहे थे, मायावती की बहुजन समाज पार्टी भी उनमें से एक थी. जबकि ऐसी स्थिति में बसपा की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती थी दलित समाज उनकी तरफ आशा से देख रही थी परंतु उनके हाथ सिर्फ निराशा ही लग रही थी. बसपाई नेता सड़क पर उतरने के लिए तैयार नहीं थे, पीड़ितों के घर जाने के लिए उनके पास वक्त नहीं था.
इतिहास में जब भी दलित राजनीति की बात उठेगी मायावती का नाम उनमें आदर से लिया जाएगा लेकिन एक सवाल उनके साथ यह भी रहेगा कि बगैर सत्ता के वह कितनी ताकतवर रही है? भारत में दलितों की समस्याएं कोई स्थायी समस्या नहीं है और पिछले एक दशक से या कह सकते हैं बीजेपी के शासन में आने से इन पर हमले और भी बढ़ते गए हैं ऐसी स्थिति में मायावती की भूमिका और भी बड़ी हो गई थी क्योंकि भारत में बहुजन समाज पार्टी ही एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी है लेकिन आज तक इन्होंने प्रधानमंत्री मोदी, प्रशासन और भारतीय जनता पार्टी से कभी भी तीखे सवाल नहीं किए बल्कि दलितों की राजनीति को ही पलटने का कार्य किया है . पूरा देश खुली आंखों से देख रहा था की यह सब बीजेपी और मोदी की सह में हो रहा हैं लेकिन वे तब भी बीजेपी के खिलाफ खुलकर मैदान में कभी नहीं आई. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ बहुजन समाज पार्टी के और दलितों के संबंध बहुत अच्छे नहीं रहे हैं यह सब हम जानते हैं परंतु आज भी मायावती इन पार्टियों को ही कोसती रहती हैं जबकि इनके साथ गठबंधन में इन्हें हमेशा ही फायदा मिलता रहा है. मायावती की राजनीतिक चूक की ही बदौलत यह संभव हुआ हैं कि प्रधानमंत्री मोदी दूसरी और तीसरी बार सत्ता में वापसी कर सके है, जिसका सबसे बड़ा खामियाजा दलितों को उठाना पड़ रहा है. आज दलितों के ऊपर बीजेपी के लोग पेशाब कर रहे हैं, उनकी स्त्रियों को नंगा करके पीटा जा रहा है, दूल्हे को घोड़े से उतारा जा रहा है, पढ़े लिखे दलित युवक बेरोजगार घूम रहे हैं और मायावती आज भी राहुल गांधी और अखिलेश से सवाल कर रही है मोदी से सवाल करने की इनमे हिम्मत नहीं हो रही.
हाल ही में मायावती ने अपने ट्वीट और साक्षात्कार में चंद्रशेखर को अप्रत्यक्ष तौर पर बरसाती मेंढक कहकर अपनी ही विशाल छवि को तोड़ने का कार्य कर रही है. जबकि चंद्रशेखर ने कभी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनका अपमान करने का साहस नहीं किया है. आखिर मायावती चंद्रशेखर से इतनी बौखलाई हुई क्यों है? क्योंकि वह समझ चुकी है कि दलित समाज लगातार उनसे छिटकता जा रहा है, वह यह भी समझ रही है कि आज चंद्रशेखर का कद उनसे बड़ा हो रहा है और वह अपनी महत्वाकांक्षा छवि को टूटते हुए नहीं देख पा रही हैं. लेकिन वह यह भूल जाती है कि वें जिस पार्टी की अगुवा है वह पार्टी एक ऐसे महापुरुष की देन है जिसने बड़ी तपस्या से इसको सींचा है. लेकिन वे आज भी सड़क पर उतरने को तैयार नहीं है .उनका कहना है की इससे कोई क्रांति नहीं होने वाली .पर वे यह भूल जाति है की फूले ,पेरियार ,रविदास ,घासीदास और आंबेडकर ने सड़कों पर उतरकर ही दलितों पिछड़ों को जगाने का कार्य किया है . इसलिए अगर मायावती अपनी छवि को बरकरार रखना चाहती हैं तो उन्हें अपने एयर कंडीशनर रूम से बाहर निकलकर अपने सहयोगियों और साथियों के साथ सड़क पर आना होगा, गलियों की धूल फाँकनी होगी सत्ता से टकराना होगा. जिस भी दलित और शोषित का अपमान सत्ता और ब्राह्मणवादी लोग कर रहे हैं उनके साथ चंद्रशेखर की तरह आधी रात को खड़ा होना होगा और मुझे नहीं लगता कि वे यह सब कर सकती है.आज की राजनीति और खास तौर पर दलितों की राजनीति की मांग यही है कि हमें एक ऐसा नेता चाहिए जो सत्ता के बगैर भी दलितों की रक्षा करना जानता हो क्योंकि सत्ता तो आती जाती रहेगी लेकिन एक बार स्वाभिमान चला गया तो उसे वापिस लाना मुश्किल हो जाता है.
डॉ.संजीव कुमार
सामाजिक एवं राजनीतिक विशेषज्ञ