देश में भ्रष्टाचार के हजार बहाने

 
     ( फोटो साभार सोशल मीडिया)
प्रभु राम के मंदिर में दान चोरी का मामला गरम है. विपक्ष को बड़ा मौका मिला हुआ है सत्ता में बैठे हुए लोगों को घेरने के लिए क्योंकि भ्रष्टाचार मुक्त भारत, रोजगार युक्त भारत, और अयोध्या मंदिर निर्माण के मुद्दे के साथ भाजपा सत्ता में आई थी और आज वह अपने किसी मुद्दे की लाज नहीं बचा पा रही है. पर क्या राम मंदिर में हुआ दान का चोरी किसी भ्रष्टाचार का हिस्सा है. इसका जवाब मै समाज पर छोड़ता हूं. बस उसमें मेरा एक सवाल जुड़ा हैं की क्या यह सरकार के बगैर मुनासिब है?
    सरकार किस-किस तरह से भ्रष्टाचार करती है और किस-किस के लिए करती है इस विषय में कभी आपने सोचा है. यहां जब मैं सरकार कह रहा हूं तो इसका अर्थ सिर्फ वर्तमान सरकार से ही न लगा करके देश और प्रदेश में पूर्व में रहे हुए लोग और वर्तमान में सत्ता में रहने वाले लोग सभी शामिल हैं. हर वर्ष जून और जुलाई के मध्य देश और प्रदेश की सरकार देशभर में जोरों -शोर से वृक्षारोपण का कार्य करवाती है. कभी आपने सोचा है कि जब हर साल इतने वृक्ष लगाए जाते हैं तो यह वृक्ष जाते कहां हैं? उसी नदी तालाब के किनारे, सड़कों और हाईवे पर हर साल लाखों वृक्ष सरकार लगवाती, आखिर इन वृक्षों में से कितने वृक्ष जीवित बच पाते हैं? हरित भारत क्रांति (ग्रीन इंडिया मिशन) के तहत सरकार पिछले पांच वर्ष (2020-25) के लिए पचपन हजार करोड़ खर्च करने का लक्ष्य निर्धारित कर वृक्षरोपण का कार्य कर रही है .इस लागत में राज्य सरकारे दस प्रतिशत अतिरिक्त अपने बजट से खर्च करती है . जरा कल्पना करके देखिए यह रकम कितनी बड़ी है. बाजार में आज एक वृक्ष की कीमत न्यूनतम सौ रूपये है उस पर मजदूर की लागत तथा ईंट /कंकृट की रकम जोड़ दिया जाए तो एक वृक्ष लगवाने में कम से कम हजार रुपए का खर्च आता है. और इसे लगवाने तथा उद्घाटन में मंत्रियों के खर्च अलग से. नतीजा दस दिन बाद वहां ना पेड़ होता है ना कंक्रीट और अगले साल फिर पुनः वही प्रक्रिया दोहराई जाती है. दशकों से यही चल रहा है. 
         वर्तमान सरकार की महत्वाकांक्षी योजना नमामि गंगे के तहत सरकार 2014 से लेकर अब तक लगभग 25000 करोड रुपए खर्च कर चुकी है. योजना के अनुसार यह खर्च गंगा की सफाई और घाटों के सुंदरीकरण पर हुआ हैं. हर वर्ष गंगा में बाढ़ आता है और गंगा जैसी की तैसी रह जाती यानी सरकार का जो लक्ष्य है सफाई का वह जैसे का तैसा ही रह जाता है. पिछले एक दशक में भारत सरकार ने हाईवे तथा बड़ी सड़क निर्माण में 20 से 25 लाख करोड रुपए खर्च किए हैं. इन हाइवे पर अचानक आपको इनके टूटे होते -जर्जर होने की खबरें मिलती रहती है. इसके निर्माण में कितनी मिट्टी, कंक्रीट, सीमेंट लग रहा है इसका हिसाब कौन ले रहा है ? यह सब बे हिसाब है. हर वर्ष देश में बरसात से पहले नालों की सफाई होती है. जिस पर अनुमानित 5000 करोड़ का खर्च आता है. यह खर्च सरकार हर साल करती है, तो यह पैसा आखिर किसकी जेब में जाता हैं. ऐसे ही देश में बहुत से कार्य होते हैं जिनका कोई हिसाब नहीं क्योंकि यही वह रास्ते हैं जिससे सरकार अपने सुधीजनों का गुप्त द्वार से विकास करती रहती है.
     भारत में दूसरा जो सबसे बड़ा घोटाला और भ्रष्टाचार होता है वह है सरकारी संस्थानों में नियुक्तियां तथा सरकारी योजनाओं का आवंटन. देश में सार्वजनिक संस्थानों में 11 महीने के लिए नियुक्तियां निकाली जाती. सरकार यह कहती है की अभी हमारे पास बजट नहीं है इसलिए कम तनख्वाह पर लोगों को रखा जा रहा है. यह वह लोग होते हैं जो किसी न किसी तरह से सरकार तथा प्रशासनिक लोगों से सम्बंधित होते हैं. ऐसे पदों पर कोई आरक्षण की व्यवस्था तथा नियमों का पालन नहीं होता. फिर यही व्यक्ति जो इन संस्थानों में कुछ तनख्वाह में काम करते हैं सरकार के खिलाफ धरना देते हैं. फिर सरकार धीरे से इनकी नियुक्ति कर देती है जो कि इन्हीं प्रशासनिक लोगों के साजिश का ही एक हिस्सा होता है . दूसरा तरीका ऐसी योजनाए निर्मित करना होता है जिनसे सीधे अपने समाज के लोगो को धन आवंटित किया जा सके .जैसे प्रोजेक्ट ,शोध ,सेमिनार ,मुद्रा ऋण इत्यादि .यह सब कार्य इतने सफाई से किये जाते है जिस पर आप उंगली भी नही उठा सकते .सरकारी उपक्रमों और शराब के ठेके पहले से ही तय होते हैं की ये किसे देना है. यह ठेकेदार अपनी बेटियों की विवाह भी ठेका मिलने तक का इंतजार करते हैं. समाज को देखने में यह लगता है कि सब कुछ बहुत ही नियमानुसार हो रहा है लेकिन सब कुछ परदे के पीछे पहले ही तय चुका होता है.
   घोटालों का पर्दाफाश वहां होता है जहां लेने वाले और देने वाले दो लोग होते हैं. परंतु सार्वजनिक उपक्रमों में सिर्फ देने वाला होता है और लेने वाला मृत ऐसे में यहां भ्रष्टाचार के लिए कभी कोई हो हल्ला नहीं हो पाता. सड़क निर्माण, वृक्षारोपण ,नदी सफाई, नाला सफाई तथा धार्मिक सेवा इत्यादि इसी सार्वजनिक उपक्रम में आते हैं.इस देश को अनेकों बार विदेशी आक्रताओं ने लूटा हैं. इसका अर्थ यही हुआ की लुटेरे बहादुर नहीं थे, उसमे कुछ अपने भी हिस्सेदार थे. इस देश में भ्रष्टाचार की जड़े आरम्भ से ही मजबूत हैं.देश हमारा सोने की चिड़िया इसलिए नहीं कहलाता की यहाँ सोने की खान थी बल्कि इसलिए कहलाता था क्योंकि प्राकृतिक रूप से यह देश दुनिया का सबसे समृद्ध और सुन्दर देश था. परन्तु लगातार अपनो के युद्ध, लूट, उन्माद, जातीय हिंसा ने इसे कबाड़ कर दिया हैं.देश की नागरिकों की नैतिकता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है की लोग ट्रेन की एसी कोच बोगियों से तावल ,चद्दर तक चुरा ले जाते है(आर टी आई में एक खुलासे के अनुसार 2022 से अब तक 104 करोड़ रूपये के तावल ,चादर चोरी हुए है ) . ये वो लोग है जो खुद को वी आई पी कहलाना पसंद करते है और मोबाइल की डीपी पर तिरंगा लगते है . यानि यहाँ हर व्यक्ति अन्दर से भ्रष्ट है सिर्फ मौके की तलाश में है . 
हमारे देश में अंग्रेजों के पुल बनाए हुए आज भी खड़े हैं. मुगलों की बनाई हुई इमारतें आज भी चमक रही हैं ( जबकि उन्हें हम ध्वस्त करने पर लगे हुए हैं ) आज जब हमारा मुल्क आजाद है हमारे हाथों में है तो इसके भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले भ्रष्टाचारियों को आखिर हम क्यों नहीं रोक पा रहे हैं. आखिर यह कौन गद्दार है जो लगातार देश को खोखला कर रहे हैं ? यकीन मानिए यह गद्दार हमारे देश के लिए अंग्रेजों और मुगलों से भी बड़े दुश्मन है.
"हमारा देश दुनिया का सबसे सुन्दर और समृद्ध देश हैं परन्तु दुनिया के सबसे असभ्य और अनैतिक लोग यहाँ निवास करते हैं "


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