हमारा देश सदैव नैतिकता की बातें करने वाला देश है ,यहां नैतिक कथाओं की भरमार है । मैं समझता हूं कि दुनिया भर में नैतिकता की इतनी कथाएं नहीं होंगी जितनी भारत में है । राष्ट्रभक्ति गीतों, काव्यों , संगीतों से हमारा समाज भरा पड़ा है । आज यदि किसी भी नागरिक से पूछिए कि वह भारत से प्रेम करता है ? तो वह कभी ना नहीं कहेगा । अगर पूछा जाए कि वह अपनी भारत के लिए क्या कर सकता है तो वह कह सकता है कि वह अपनी जान दे देगा ,और इसी बात से वह अपनी राष्ट्रभक्ति से आपको संतुष्ट कर देता है .परंतु आज भारत को आपकी जान की नहीं आपके नैतिकता की आवश्यकता है । आज आप अपने गिरेबान में झाककर देखिए आप डॉक्टर है, इंजीनियर है, वकील है ,मंत्री है ,नेता है, शिक्षक है छात्र है पर क्या आप नैतिक नागरिक है ? एक राष्ट्र का निर्माण उसके नागरिकों से होता है । आपका देश कितना भी सुंदर क्यों ना हो अगर आपके नागरिक उसकी सुंदरता की रक्षा नहीं कर सकते तो आपका देश महान नहीं रह सकता । फिर चाहे आप कितना भी कपोल कल्पित कहानी अपने शास्त्रों में, अपने पोथियों में गढ़ते रहिए यह ज्यादा दिन टिकने वाला नहीं है इसकी थोथलता जल्द ही दुनिया के सामने आ जाएगी ।
गौर कीजिए यदि आपके घर में सब कुछ मौजूद हो ईट , पत्थर, रेत, लोहा, हीरे –मोती , जवाहर सुंदर जमीन , नदिया हो परंतु इन सब के बावजूद आपके पास पहनने के लिए वस्त्र नहीं है ? आप भरपेट खाना नहीं खा पा रहे है ? आपके पास अच्छे सुविधायुक्त वाहन नहीं है ? लोगों का जीवन बचाने के लिए अस्पताल नहीं है तो यह किसकी कमी है आपके देश की या फिर आपकी ?
खैर यह तो बड़ी-बड़ी बातें हैं छोटी बातों पर भी अगर हम ध्यान दें तो भारत बहुत सुंदर हो सकता है ।कभी आपने ध्यान दिया है जब भी हम किसी कतार में खड़े होते हैं चाहे वह रेलवे का टिकट लेना हो या फिर गैस एजेंसी में गैस के लिए लाइन में खड़ा होना हो या फिर इलेक्ट्रिसिटी बिल भरने के लिए कतार में खड़ा होना हो या फिर किसी ट्रेन या बस में बैठे हो वहां किसी को सीट देने वाली बात हो तो ऐसे किसी भी जगह हम किसी की मदद करते हैं या नैतिकता से कतार में खड़े होते है ? मैं दावे के साथ कहता हूं बड़ा से बड़ा विचारक और महान से महान शब्दों के बल पर जीने वाला व्यक्ति भी किसी कतार में खड़ा होना अपने शान के खिलाफ समझता है ।वह एक गरीब के पीछे कभी खड़ा नहीं होना चाहता ऐसा करने से उसकी प्रतिष्ठा धूमिल हो जाती है क्योंकि इस देश में कतार गरीबों के लिए ही है ऐसा हम मानते है । विद्रूप यह भी है कि आज पंक्तियों में खड़ा होना आपकी नाकाबिलियत का पहचान माना जाता है ।पर उनका क्या दोष है जो काबिल नहीं है, कतार में खड़े हैं भूखे नंगे हैं मजलूम है मजबूर हैं वह भी तो हमारे ही देश के नागरिक है उनके भी खून पसीने मिले हुए हैं देश की मिट्टी में ,उनका भी उतना ही अधिकार है इस देश की हवा - पानी में इस तिरंगे में जितना हमारा है तो फिर हम उन्हें अपने से पीछे क्यों खड़ा करें या फिर उनके कतार में हम आगे क्यों आ जाए ? आज हमारे नेता जाति और धर्म के नाम पर हमें जब चाहे लड़ा देते है, हम महंगा राशन खरीद रहे हैं महंगा पेट्रोल खरीद रहे हैं, महंगा इलाज करवा रहे हैं, हमारी शिक्षा बत्तर होती जा रही है पर यह हमारी मूल समस्या नहीं है हमारे मूल समस्या आई है कि आज से हजार साल पहले हमारी जाति बड़ी थी उनकी जाति छोटी थी, हमारा धर्म बड़ा था उनका धर्म छोटा था इसी बहस में उलझे हुए हैं और एक दूसरे का सर फोड़ रहे है. सोचिए जब आज हम अत्यधिक हो चुके हैं ज्ञान से भरे हुए हैं तब भी अपना भाईचारा भूल कर एक दूसरे के खिलाफ खड़े हैं और देश के विकास में बधाए उत्पन्न कर रहे हैं तो हजारों साल पहले हमारी मानसिकता कैसी रही होगी कितना आसान होता होगा हमें आपस में लड़ना और हम पर हुकूमत करना? हम बार बार इसी सवाल में उलझ जाते है कि हमें इस कौम ने सताया उस जाति ने सताया इसने गुलाम बनाया उसने गुलाम बनाया पर हम कभी यह खुद से यह सवाल क्यों नहीं करते कि यह लोग आखिर हमारे देश में आए कैसे? हमने इन्हें अवसर कैसे दिया? इसलिए बेहतर होगा कि हम अपने अतीत कों आईना की तरह अपने सामने रखकर अपना भविष्य सवारे न कि आपस में लड़कर सरकार से सवाल पूछना बंद कर दें. दूसरी बात ये कि आज भी हम देश का अर्थ सरकार से समझ लेते हैं और यह मान लेते हैं कि हमारी सारी जिम्मेदारी सरकारों की है हमारी रोटी हमारा अस्पताल हमारा रोजगार यहां तक कि हमारा नाला भी साफ करने की जिम्मेदारी सरकार की है।क्या यह सही है ?यह सोचने वाली बात है अगर हर व्यक्ति अपने आसपास की सफाई रखें हर सार्वजनिक स्थानों का ध्यान रखें और उसे अपना समझे अपने घर की तरह उसकी देखरेख करें । देश के हर नागरिक को वह अपने भाई की तरह समझे और उसके सुख-दुख को अपना ही समझे। परंतु यह सब बड़ी नैतिकता की बातें हैं जो हमें सिर्फ किताबों में पढ़ाई जाती है हम इन्हें सत्संगों में सुनते हैं और वाह -वाह करके वहां से चले आते हैं। इस किताब में अच्छी बात लिखी थी, उस संत ने अच्छी बात कही थी, इस महात्मा ने अच्छी बात कही थी ,गुरु जी ने अच्छी बात कही है हमारे नेता ने अच्छी बात कही है हमारे पौराणिक ग्रंथों में अच्छी बातें लिखी है पर वह अच्छी बातें जमीन पर है कहां है ? वह दिखाई क्यों नहीं देता हमारे व्यवहार में हमारे चरित्र में हमारे सामाजिक बर्ताव में । हम चिड़चिडे हो गए हैं मनुष्य को देखते ही हमें नफरत सी हो जाती है आज भी हम अनेक वर्गों में बंटे हुए हैं, जातियों और धर्म बटे हुए है जिसकी एवज में हम अनगिनत गैर मुल्कों के अधिन रहे है ।यह बंटने का सिलसिला हजारों साल से चला आ रहा है पर हम सुधरने को तैयार नही तो क्या ऐसी स्थिति में हम एक महान देश के नागरिक बनने के योग्य है? आज भी समाज में कुछ लोग ऐसे है जो अपने से दुगुने उम्र के व्यक्ति को प्रणाम करते है और सामने वाला आशीर्वाद देता है जिसे हम इस देश की महान सभ्यता समझते हैं। कुछ लोग ऐसे है जो जन्मजात स्वयं को मनुष्यों में जाति,कुल के आधार पर श्रेष्ठ समझकर दूसरों को दोयम दर्जे का व्यक्ति समझते है ।
मैं चाहता हूं यह सवाल देश का हर युवा स्वयं से करें और यह सवाल अपने आसपास लोगों से भी करें और जवाब को उनके बर्ताव से परखें ।लोग बोलने ,लिखने के लिए तो बहुत ऊँची –ऊँची बातें करते है पर ऐसा यदि होता तो देश में अनगिनत अनैतिक समस्याएँ नहीं होती । जब तक हम अंतरात्मा से नैतिक नहीं होते तब तक यहाँ हजारों समस्याएँ बनी रहेंगी ।हर पीढ़ी युवावों से परिवर्तन की उम्मींद करती है क्योंकि इस देश ने स्वामी विवेकानंद , ईश्वरचंद्र विद्यासागर ,भगत सिंह ,चंद्रशेखर आज़ाद ,लाल बहादुर शास्त्री जैसे युवा दिए है जिन्होंने अपने विचारों से अपनी नैतिकता से पुरी दुनिया को रौशन किया है और हमारे युवाओं कों इनका अनुसरण करना होगा तभी हम सच्चे राष्ट्रभक्त बन पाएंगे.
लेखक
डॉ .संजीव कुमार
राजनीतिक विशेषज्ञ