आजादी के सात दशक बाद भी हम एक परिपक्व नागरिक नहीं बन सके हैं . आज भी हमारे देश के लोग, संस्थाएं, नेता एक फिल्म से डर जाते हैं एक लेखक से डर जाते हैं एक पत्रकार से डर जाते हैं यहां तक की एक विद्यार्थी के विचार से भी हम डर जाते हैं. क्या इतना कमजोर और खोखला है हमारा लोकतंत्र? कहीं हम व्यक्ति पूजा के पीछे अपना विवेक तो नहीं खो चुके हैं? ऐसा सच मुच है तो आपको ज्योतिबा की किताब गुलामगिरी जरूर पढ़नी चाहिए और किताब नहीं पढ़ सकते तो कम से कम उनकी आने वाली 'फुले'फिल्म ही देख लीजिए.
इस 25 अप्रैल को भारत के सिनेमाघरों में पहली बार भारत के अपनी लोकप्रिय भाषा में 18 वीं सदी के महान समाज सुधारक, और भारत में मजबूत स्त्री शिक्षा का नींव रखने वाले ज्योतिबा फुले जी पर फिल्म लगने जा रही हैं.यह फ़िल्म 10 अप्रैल को रिलीज होने थी परंतु भारतीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड कों इसके कुछ दृश्य भारतीय समाज को ठेस लगने वाले लगे इसलिए उन दृश्यों को हटाकर रिलीज किए जाने कों सेंसर बोर्ड ने इज़ाज़त दी हैं.
फिल्म अभी सिनेमाघर में लगी भी नहीं हैं और इस पर हर तरफ क्रिया प्रक्रिया समाज में देखने को मिल रही हैं. अब सवाल यह है कि ऐसा इस फ़िल्म में क्या था जिसे सेंसर बोर्ड पूर्ण रूप से समाज में नहीं दिखाना चाह रहा है. इस फिल्म के निर्देशक अनंत महादेवन का कहना है कि सेंसर बोर्ड ने उन दृश्यों को काटने कों कहा है जो कि ज्योतिबा फुले जी के समाज सुधार का सबसे बड़ा अंग है. वह क्या दृश्य होगा ज्योतिबा फुले जी को पढ़ने वाले अच्छी तरह जानते हैं, अब बात यह रह गई कि आखिर उन सब कार्यों को जानने का हक़ क्या समाज को नहीं है जिन कार्यों के लिए ज्योतिबा फुले जी और उनकी पत्नी सावित्री फुले जी ने अपना पूरा जीवन खपा दिया.
भारतीय इतिहास चाहे यह कितना भी छुपाने का को प्रयास करें कि इस देश की संकीर्णता और नाकामयाबी के पीछे जितना हाथ ब्राह्मणवाद, मनुवाद,सामंतवाद का रहा है उतना हाथ विदेशी आक्रमाणकारियों का भी नहीं हैं,वह छुपाया नहीं जा सकता. हम सब जानते हैं जिस दौर में ज्योतिबा गोविन्दराव फुले का जन्म हुआ था उस दौर में महाराष्ट्र,पुणे जातीय संकिर्णता, पाखंडवाद और धर्मांधता से बजबजा रहा थे. आप सब ने जो इतिहास में और सोशल मीडिया पर देखा -पढ़ा होगा कि शुद्रो के गले में थूकने के लिए हांडी बाँधी जाती थी, पैर में निशान मिटाने के लिए झाड़ू बांधे जाते थे, नए वस्त्र पहनना मना था और स्त्री- पुरुष शिक्षा पूर्ण तरह से वर्जित था. खासतौर पर स्त्री शिक्षा का तो कोई प्रावधान भारतीय इतिहास में इसके पहले कभी रहा ही नहीं यह वही दौर था.
11 अप्रैल 1827 में पुणे महाराष्ट्र में जन्म लेने वाले ज्योतिबा गोविंद राव फुले भी एक साधारण व्यक्ति थे. वह भी अपने पिता की तरह फूलों के व्यवसाय से अपना घर परिवार देखने का कार्य करते थे परन्तु जब एक ब्राह्मण भोज में उन्हें अपमान का सामना करना पड़ा तब उनके हृदय कों बहुत गहरी ठेस लगी और यहीं से उन्होंने ब्राह्मणवाद पर विचार करना आरंभ किया. मात्र सातवीं कक्षा तक अध्ययन करने वाले ज्योतिबा फुले जी ने तत्कालीन भारतीय समाज में फैले कुरीतियों से लड़ने और समाधान के लिए तब सत्यशोधक समाज की नींव रखी. यह वही दौर है जब केरल के त्रावणकोर मैं दलित स्त्रियों को स्तन ढकने के लिए भी कर देना पड़ता था, कुछ स्थान पर तो इसका भी जिक्र है कि दलित स्त्रियों को शादी की पहली रात वहां के जमींदार के साथ गुजारनी पड़ती थी. ऐसी परिस्थिति में जन्मे ज्योतिबा फुले जी की मानसिक स्थिति का आप आकलन कर सकते हैं. वर्तमान भारतीय समस्याओं की जड़ तलाशते हुए अंततः ज्योतिबा जी इस अध्ययन पर पहुंचे कि इन सब के पीछे भारतीय समाज का शिक्षा स्तर में बहुत पिछड़ना ही सबसे बड़ा कारण है और इसके लिए उन्होंने स्त्री शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया. पर जब स्त्रियों के शिक्षा के लिए उन्होंने विचार किया तो उनके सामने समस्या यह थी कि स्त्रियों को घर जाकर पढ़ाएगा कौन? फिर ज्योतिबा जी ने अपनी पत्नी सावित्री फुले जी को आगे किया, इसके लिए उन्होंने स्वयं पहले अपनी पत्नी को शिक्षित किया फिर उन्हें घर-घर जाकर के स्त्रियों की शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया जिसका कुंठित समाज ने पुरजोर विरोध किया.
आज भारत के वंचित समाज में पाखंड और जातीय भेद भाव से लड़ने का जो साहस हैं, जिनके माध्यम से इन समाज में बौद्धिक विकास हुआ हैं उसके पीछे निश्चय ही फुले द्वारा दिखाया गया ज्योत ही हैं. इस ज्योति का जो महापुंज हैं उनमें डॉ अम्बेडकर जैसे जगत विख्यात विद्वान भी शामिल हैं.जिन महापुराणों का बखान करते हुए सामंतवादियों ने हजारों साल तक दलितों, पिछड़ों का शोषण किया हैं, जिनकी वजह से यह राष्ट्र कभी एक न हो सका, जिनकी वजह से अनगिनत आक्रताओं का इस देश ने दंश झेला हैं उन पुराणों का ज्योतिबा जी ने बहुत कठोर शब्दों में विरोध किया था.जिसका परिणाम यह हुआ कि भारत में जातीय सड़न्ध पर खुल कर बात होने लगी और इसकी रोटी खाने वाले सिकुड़ने लगे, गटर साफ करने वाले स्वाभिमान कि लड़ाई लड़ने लगे.
आज देश में समानता कि जो बातें हो रही हैं,देश कि महिलाएं शिक्षा हासिल कर देश कि उन्नति में हाथ बटा रही हैं उन सबके लिए राष्ट्र कों उनका श्रीणी होना चाहिए.
डॉ संजीव कुमार
राजनितिक विशेषज्ञ