22 अप्रैल को पहलगाम में आतंकी हमला हुआ जिनमे लगभग 28 निर्दोष भारतीय नागरिक मारे गए ऐसे में सरकार को देश भर के आक्रोश का सामना करना लाजमी था । उस वक्त प्रधानमंत्री मोदी जी विदेशी दौरे पे थे परन्तु हमले की सूचना मिलते ही तत्काल अपना विदेशी दौरा रद्द करके भारत लौट आते हैं । ऐसे में देशभर के लोगों द्वारा यह कयास लगाया जा रहा था कि वह तुरंत कश्मीर दौरा करेंगे और पीड़ितों से मिलेंगे पर उन्होंने फिर एक बार साबित कर दिया कि उनके लिए राष्ट्र सुरक्षा और भारतीय नागरिकों से ज्यादा जरूरी चुनाव है और वे अगले ही दिन नितीश बाबू के साथ जनसभा में गप्पे मारते नजर आए । जब सरकार पर सुरक्षा में चूक सहित कई तरह के सवाल उठाए जा रहे थे और इस विकट परिस्थिति में फिर सरकार को जब आतंकवादियों पर त्वरित कार्रवाई करने की जरूरत थी तब उसने देश और विपक्ष का ध्यान भटकाने के लिए 28 अप्रैल कों आनन –फानन में जाति जनगणना की घोषणा कर दी ।
आप सब अगर राजनीति की थोड़ी सी भी समझ रखते होंगे तो आपको याद होगा जब-जब मोदी सरकार देश के आक्रोश में उलझती है तब - तब वह देश का ध्यान भटकने के लिए एक नया शिगुफा छेड़ देती हैं । बिहार जैसा क्षेत्र जिस पर बीजेपी की पूरी नजर है जैसे उसकी नजर महाराष्ट्र पर थी ( समर्थन दे देकर थक चुकी बीजेपी ने महाराष्ट्र की राजनीति में ऐसा फूट डाल कि वहां की मजबूत पार्टियाँ बिखर गई और एकनाथ शिंदे को दरकिनार कर पूर्ण बहुमत लाकर अपनी सरकार बना ली ) अब वह बिहार में भी पूर्ण बहुमत हासिल करना चाहती है और नितीश इस खतरे को पहचान नहीं पा रहे हैं । दरअसल बीजेपी जो करना चाहती है उसमे कही न कही बिहार बाधा डाल रहा है ,मोदी चाहते है कि नीतिश का उन्हें समर्थन मिले परन्तु सशर्त नहीं और यह तभी होगा जब बीजेपी बिहार में पूर्ण बहुमत का सरकार बनाने में कामयाब होगी ।
मोदी आज चुनाव कराने, जिताने के अलावा कुछ नहीं सोच पा रहे हैं । देश की शिक्षा, मीडिया, युवा ,धार्मिक उन्माद का इस तरह शिकार हो चुके हैं कि उन्हें अपना भविष्य तक नहीं दिखाई दे रहा । इस साल हरियाणा के लगभग 18 स्कूलों में बोर्ड परीक्षा में एक भी विद्यार्थी सफल नहीं हुआ यह कितनी शर्मनाक घटना है एक विकसित होने वाले भारत के लिए, 21वीं सदी मैं दुनिया के साथ ताल मिलाने वाले भारत के लिए । सोचिए अगर यह घटना किसी ऐसे राज्य में हुई होती जहां बीजेपी की सरकार नहीं होती तब यह कितना बड़ा मुद्दा होता? विश्व गुरु का दंभ भरनेवाली यह सरकार शिक्षा के सवाल पर आखिर इतना मौन क्यों है ? तो फिर मेरा अगला सवाल यह है कहीं जाति जनगणना की जो घोषणा मोदी जी द्वारा की गई है( विपक्ष और देश का मूड भाँपते हुए )बिना किसी तैयारी बगैर किसी योजना के इसके पीछे मोदी जी की मंसा कही 2029 लोकसभा चुनाव तो नहीं है?
क्योंकि हम जानते है 2019 का चुनाव लगभग बीजेपी हार ही चुकी थी । बेरोजगारी पर चुप्पी और एससी एसटी एक्ट को खत्म करने की अपनी योजना में विफल होने पर देश का जनाधार बिल्कुल बदल चुका था लेकिन ऐसे में पुलवामा हमला होता है और मोदी को राष्ट्रभक्ति का चारा पानी मिल जाता है जिसे वह भुनाने में सफल हो जाते हैं और सत्ता में वापसी कर लेते है । 2024 लोकसभा चुनाव बीजेपी 400 पार का नारा लगा रही थी क्योंकि उसे भरोसा था कि अयोध्या में बने राम मंदिर की वजह से उसे पूर्ण बहुमत हासिल होगा लेकिन फिर एक बार वह हिंदू मुस्लिम के खेल में असफल हो जाती है और अब वह नितीश बाबू के बैसाखी पर खड़ी हैं । इसीलिए वह बिहार में नितीश बाबू का पूरा सफाया करते हुए अपनी भावी योजना तैयार कर रही है । मोदी अब समझ चुके हैं कि हिंदू- मुस्लिम का खेल अब ज्यादा दिन टिकने वाला नहीं हैं इसलिए वह जाति जनगणना पर अगले चुनाव के लिए दाव लगाने जा रहे हैं ।
पूर्ण नैतिकता से जाति जनगणना करवाना वह भी एक ऐसी पार्टी और ऐसी सरकार के द्वारा जिनके शासन में दलितों पर मूतने वाले को बधाई और इनाम दिया जाता हो, दलित स्त्रियों को नंगा करके थाने में पीटा जा रहा हो उससे उम्मीद करते हैं कि वह नैतिकता पूर्ण जाति जनगणना करेंगे और देश के शोषित वंचित के साथ न्याय करेंगे? अगर मोदी जी ने यह जनगणना करवा भी ली तो उसकी सूचना 2028 के पहले आपको नहीं मिलेगी और उस जनगणना आंकड़ों का मोदी भरपूर प्रयोग करेंगे । वह ऐसी बड़ी-बड़ी घोषणाए करेंगे जिसके चक्रव्यूह में एक बार फिर पूरी भारतीय जनता फंसेगी क्योंकि जिस देश के नागरिक 5 किलो राशन पर 12 साल से शिक्षा विहीन, सुरक्षा विहीन कर्ज में फंसकर मोदी को वोट देते आ रहे हैं वह जाति जनगणना के पश्चात होने वाले बड़े-बड़े वादों के चंगुल में भला कैसे नहीं फसेंगे । अगर आकड़ो से ही देश के वंचित समाज का भला मोदी करना चाहते तो अकड़े तो आज भी उनके पास है फिर भी एक बार मै आप सबको याद दिला दूँ कि देश के 90% संपत्ति पर सवर्णो का एकाधिकार है, भारत के 100 उच्च रईसों में कोई भी दलित नहीं है, देश के सुप्रीम कोर्ट में एक भी आदिवासी जज नहीं है और उच्च न्यायालय में अनुसूचित जाति और जनजाति के 4% लोग भी नहीं हैं । देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालय, राज्य स्तरीय विश्वविद्यालय तथा कॉलेजों में कितने दलित है यहै सब आप अच्छी तरह जानते हैं । जब मोदी जी अपने तीसरे कार्यकाल तक भी यह आकड़े नहीं बदल सके है तो भला अब कौन सा वह तीर मरने वाले है | इसलिए दलितों ,बेरोजगारों ,महिलाओं को उनसे बहुत अपेक्षा करने की जरुरत नहीं है । जो लोग इस भ्रम में है कि जाति जनगणना से भारत में बहुत बड़ी क्रांति आ जाएगी तो उन्हें नींद से जाग जाना चाहिए खासतौर पर दलितों को क्योंकि जब तक वे सरकार के सहारे बैठे रहेंगे उनका यू ही शोषण होता रहेगा ।
डॉ.संजीव कुमार
सामाजिक एवं राजनीतिक विशेसज्ञ