2000 साल से भी ज्यादा दलित आदिवासियों ने मनुष्य होने की लड़ाई लड़ी है। अनगिनत महापुरुष विद्वान संत यह लड़ाई लड़ते-लड़ते खत्म हो गए। तब कहीं जाकर के दलितों के नसीब में मनुष्य होना लिखा गया।
स्थिति आज भी बहुत ज्यादा अच्छी नहीं है हां यह अलग बात है कि आज सबके पास (आदिवासियों) तन ढकने को कपड़े हैं पेट भर अनाज है। जमीने इनकी छीनी जा चुकी है इसके लिए यह लगातार संघर्ष कर रहे हैं। सत्ता और शासन का जो सुख प्राप्त है वह सिर्फ और सिर्फ संविधान की वजह से है इनमे इनकी काबिलियत का कोई स्थान नहीं है। शासक वर्ग जो हमेशा से इस धरती पर अपना प्रथम अधिकार समझता है वह इन्हें कभी भी काबिल नहीं समझता। पर यह भी सच है दलितों की लड़ाई में कई गैर दलितों ने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया है। इस विषय पर मैं फिर कभी लिखूंगा आज मैं उनके लिए लिख रहा हूं जो दलित समाज से तो है परंतु फिर भी जब संविधान की बदौलत समाज में कुछ इज्जत दौलत पा जाते हैं तो वह खुद को इस समाज से दूर कर लेते हैं और वह भी जमींदारों की तरह अपने ही समाज पर हुकूमत करना चाहते हैं।
1.शिक्षित दलित समाज
2.राजनीतिक दलित समाज
3.व्यापारी दलित समाज
4.सरकारी सेवा प्राप्त दलित समाज
5.अशिक्षित समाज
1.शिक्षित दलित समाज
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने एक बार स्वयं यह कहा कि मुझे मेरे पढ़े लिखे समाज ने धोखा दिया है। यह बात आज भी बड़े आसानी से दलितों के बीच देखी जाती है। एक प्रबुद्ध दलित पढ़ा लिखा दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में उसके साथ चलना पसंद नहीं करता वह अपनी एक अलग दिशा बनाता है और एक अपनी अलग टीम बनाने की कोशिश करता है। उन्हें डर लगता है कि कहीं अगला व्यक्ति उनसे आगे ना निकल जाए।
ऐसे लोग समाज में लच्छेदार भाषण तो जरूर देते हैं परंतु जब इनकी स्थिति इनके गांव में जाकर तलाशी जाती है तो प्राप्त जानकारी यह मिलता है इन्होंने अपने आसपास के लोगों का ही भरपुर शोषण किया है।
जब यह उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं तब भी यह अपने समाज को उच्च शिक्षा की ओर धकेलने में नाकामयाब रहते हैं उन्हें ये डर सताता हैं कि यह एक लंबी प्रक्रिया है आप इससे नहीं गुजर सकते ।और इनकी डरावनी ख्याल की वजह से दलित समाज के बच्चे उच्च शिक्षा का मोह त्याग देते हैं । फिर सरकार की स्किल इंडिया में उलझ जाते हैं, और इस तरह यह अपने आसपास के लोगों पर हावी रहते हैं यह सब करके इन्हें ऐसा लगता है कि यह बड़े जागरूक हैं बाकी सब इनके बराबर काबिलियत नहीं रखते।
2.राजनीतिक दलित समाज
अंबेडकर के नाम पर इस देश में अनगिनत दलित नेता और राजनेता बने हैं। इन्होंने दलित समाज सुधार के नाम पर खूब आंसू बहाए और वोट हासिल करके अपने परिवार के लिए अकूत संपत्ति बनाएं। शुरुआती दौर में तो यह दलितों के लिए खूब लड़ने का दंभ भरते हैं पर जैसे ही अवसर प्राप्त होता है सुख सुविधा हासिल करने की यह अपने समाज को पीछे छोड़ कर के आगे बढ़ जाते हैं। मेरे कई करीबी ग्राम प्रधान है जो दलितों के वोट से ग्राम प्रधान तो बन गए पर उन्होंने सबसे पहला चोट अपने ही लोगों पर किया। गांव की बंजर जमीन पर अंबेडकर की मूर्ति रखे जाने के नाम पर ग्राम प्रधान ने वोट तो प्राप्त किया पर जब उस जमीन की अच्छी कीमत उसे प्राप्त हुए तब कानूनी दांवपेच लगाकर के जमीन को ही उसने बेंच दिया। गांव की अंबेडकर प्रतिमा आज भी थाने में धूल खा रही है।
दलित बस्तियों के अलावा सभी बस्तियों में पक्के नाले और खड़ंजे लगवाया और अपने लोगों को यह कह करके बेवकूफ बनाते रहे कि हमारे लिए घर जरूरी है और आवास के नाम पर भी उनसे खूब पैसे वसूली जाती हैं । ऐसी कहानियां देश के हर गांव और समाज में आपको देखने को मिल जाएगी।
3.व्यापारी दलित समाज
आज देश भर में अनेकों दलित अच्छे व्यापारी है । एक दिन मुझे एक युवक मिला जिसने बिल्डिंग का अच्छा व्यापार सीख लिया है और अब अच्छा कमाता है। उसने छुआछूत पर विरोध जताते हुए कहा कि अब ऐसा कुछ नहीं है जो मेहनत करेगा वह आगे बढ़ेगा उसे शायद पता नहीं कि उसे यह मेहनत करने का अधिकार भी उस संविधान से प्राप्त हुआ है जिसे लंबे संघर्ष करके अंबेडकर ने लिखा है। ऐसे ही बहुत से दलित व्यापारी हैं जो यह मानते हैं कि उन्होंने जो प्राप्त किया है वह उनकी काबिलियत और मेहनत की वजह से है, पर वे यह भूल जाते हैं कि उनकी पीढ़ियों ने वर्षों संघर्ष किया है वह भी मेहनती थे पर उन्हें कभी काबिल नहीं समझा गया और उनकी संपत्तियों को लोगों ने पाखंड से लूट लिया।
4.सरकारी सेवा प्राप्त दलित समाज
ऐसे कितने दलित हैं देश में जिन्होंने आरक्षण के बगैर नौकरी हासिल की हैं?पर जब वे नौकरी प्राप्त कर लेते हैं तो उन्हें लगता है कि वह बहुत ही काबिल है और अपनी काबिलियत के दम पर नौकरी हासिल की है। यहां मैं बताना चाहूंगा कि यह पढ़े लिखे लोग भी अपने समाज के काबिलियत को भूल जाते हैं। जब देश में संविधान नहीं था तब भी हमारे लोग बहुत काबिल थे पर उनके पास दो वक्त की रोटी भी नहीं थी। वे यह भूल जाते हैं कि उन्हें जो यह सुख प्राप्त है उसके पीछे उन लोगों का त्याग है। परंतु यह उनके त्याग को प्रणाम करने की बजाय अपने ही समाज में जमींदार बनने की कोशिश करने लगते हैं।
चपरासी और डी ग्रुप की नौकरियां प्राप्त करने वाले दलित पैसे का गलत प्रयोग करने लगते हैं। उन्हें लगता है इस धरती पर अब उनसे बड़ा कोई रईस नही है और अपनी बड़ी पूंजी जुआ तथा शराब में उड़ा देते हैं और इस तरह फिर से अपनी पीढ़ी को पीछे धकेलने में लग जाते हैं।
5.अशिक्षित दलित समाज
अशिक्षित दलित समाज आज चारों तरफ से पीसा जा रहा है। धार्मिक लोग उन्हें धर्म के नाम पर बहका रहे हैं ,राजनीतिक लोग दूर के सपने दिखाकर के घुमा रहे हैं और उनके समाज के लोग उनका हितैषी बनने का ढोंग करके अपने घर झाड़ू पोछा लगवा रहे हैं।
और ऐसी हताशा में यह मजदूरी करके जो चार पैसा लाते हैं उसे भी ठीक से सहेज नहीं पाते,उसे कहां खर्च करना है उन्हें यह कोई बताने वाला नहीं है। और इस तरह वे अपनी गाढी कमाई गलत सहबतो और गलत जगह खर्च करके सरकार की तरफ लाचार होकर देखते रहते हैं।
डॉ.संजीव कुमार