सामाजिक संरचना में प्रोफ़ेसर की भूमिका और एनएफएस का खेल


डॉ. संजीव कुमार
सामाजिक एवं राजनीतिक विशेसज्ञ
 बचपन में मैंने एक दिन पिताजी से पूछा की  'सबसे ऊंची शिक्षा क्या होती है' उन्होंने कहा पीएचडी ,मैंने फिर पूछा क्या इसके बाद पढ़ाई खत्म हो जाती है ! उन्होंने कहा नहीं परंतु इतना शिक्षा हासिल करने के बाद एक आदमी हजारों मनुष्यों का जीवन बदल सकता है । धीरे-धीरे जब मैं विश्वविद्यालय तक पहुंचा तब मैंने प्रोफेसरों की लॉबी के बारे में सुना । जिस तरह गांव में लोग जातियों में बटे हुए अपने-अपने खेमे में रहते हैं ठीक उसी प्रकार विश्वविद्यालयों में भी सभी प्रोफेसर जाति विचार और धर्म के नाम पर अपना सर्कल बनाएं हुए हैं । आज के दौर में आपको इन विश्वविद्यालयों में संघ और उससे जुड़ी हुई विचारधारा के लोग सभी जगह जड़े जमाए हुए हैं दूसरे स्थान पर वामपंथी हैं लेकीन उनकी संख्या इनके दशवें हिस्से के बराबर भी नहीं और एक प्रतिशत से भी कम स्थिति में अम्बेडकर वादी हैं ।  समाज में जो  थोड़े बहुत प्रोफ़ेसर आपको दिखाई दे रहे है वे इसी दुसरे और तीसरे खेमे की वजह से संभव हो पाता है ।  ऐसी परस्थिति में आपका बच्चा जब यहां दाखिला लेता है तब वह सत्ता और इसकी चालाकियों  से बड़ा दूर होता है।  अभी तक वह  धर्म और जाति के नाम पर शारीरिक भेदभाव को ही समझ रहा होता है लेकिन अब उसे मानसिक भेदभाव के विषय में लड़ना और सतर्क रहना सिखाया जाता है। 
     स्नातक और स्नातकोत्तर तक की शिक्षा आप थोड़ी आसानी से भले हासिल कर ले परंतु मजदूर और शोषित जातियों के साथ असली खेल शोध में दाखिले ( पीएचडी) के साथ आरम्भ होता है ।  यहां से असली संकीर्णता और जातिवाद आरंभ होती है वे लोग जो कहते हैं कि आज देश में जातिवाद खत्म हो गया है उन्हें अगर विश्वविद्यालयों में व्याप्त घोर जातिवाद के बारे में पता चलेगा तो पैरों तले जमीन नज़र नहीं आएगी।  आपके साथ फिल्म देखने वाला आपके साथ खाना खाने वाला आपके उच्च शिक्षा मैं आते ही आपके साथ असली भेदभाव करना आरंभ कर देता है इसका ताजा उदाहरण बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हफ्तों धरने पर शोध में दाखिले के लिए शुभम सोनकर के द्वारा धरना –प्रदर्शन से आप समझ सकते हैं, थोड़ा और विवेक पर जो डाले तो 2016 में रोहित वेमुला की आत्महत्या भी इसी जातिवाद का परिणाम था। 
   दलितों आदिवासियों और पिछड़ों को शिक्षा से रोकने का कार्य सदियों तक होता रहा है परंतु  अब जब उन्हें संवैधानिक अधिकार प्राप्त है तब देश के शीर्षस्थ और महत्वपूर्ण संस्थानों में जहां चारों तरफ आपको सवर्ण ही दिखाई देंगे वे इन उच्च संस्थानों में आपको बिल्कुल नहीं पसंद करते।  महात्मा फुले संत गाडगे और डॉ।  अंबेडकर ने अथक इन वंचित जातियों को शिक्षा की तरफ मोड़ने का प्रयास किया जिसका परिणाम ये हैं की आज इस 140 करोड़ की आबादी में कोई दस  प्रोफेसर इस समाज से निकल कर अपने समाज को रोशनी दिखाने का कार्य कर रहे हैं, जिन्हें सवर्ण समाज बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करना चाहता, उन्हें यह कतई पसंद नहीं कि आप उनके बराबर उनकी कुर्सी पर बैठे हैं।  आप देश के बॉर्डर पर देश की सेवा कीजिए, देश के सड़क नाले साफ कीजिए, देश के फैक्ट्री में उनके लिए उत्पाद पैदा करिए, देश की खेतों में उनके लिए अनाज पैदा करिए, उनके रहने के लिए मकान बनाइये लेकिन उनके सामने बैठकर उनकी  बातों का पलट कर जवाब देने की हिम्मत मत करिए। 
   डॉ अंबेडकर ने शिक्षा को शेरनी का दूध कहा है आज यह दूध हर दलित पीने का प्रयास कर रहा है तिस पर इन्होंने शिक्षा को इतना महंगा कर दिया है, इसका इतना व्यावसयिकारण कर दिया है जिसके लिए आज दलितों को अपने परिवार से किसी एक बच्चे को उच्च शिक्षा तक पहुंचाना महासागर पार करने जैसा है और गलती से वह यह  महासागर पर भी कर लेता है तो उसके लिए प्रोफेसर बनने के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं।  क्योंकि वह जानते हैं कि एक प्रोफेसर अपने जीवन में कम से कम हजारों लोगों का जीवन बदल सकता है अतः वे एड़ी चोटी का जोर लगाकर आपको यहाँ पहुँचने से रोक देते है ।  शिक्षा का शीर्षस्थ स्थल विश्वविद्यालय माने जाते हैं और इसकी सबसे बड़ी इकाई इनमे पढ़ाने वाले प्रोफेसर होते हैं, यह प्रोफेसर विद्यार्थियों के आत्मा में हृदय में जैसा बीज होते हैं समाज में वह उतना ही विशाल वृक्ष बनकर तैयार होता है।  आजादी के बाद भी जब इन विश्वविद्यालयों में शोषक जातियों का ही नियंत्रण रहा हैं तब आप देश के सोचने समझने की शक्ति को समझ सकते हैं कि देश की रगों में रक्त की तरह बहने वाले युवाओं के मन मस्तिष्क में कैसी विचारधाराए बहती होंगी।  और जब इस विचारधारा का तोड़ने का काम डॉ लक्ष्मण यादव डॉ रितु सिंह डॉ रतन लाल जैसे लोग करते हैं तो पूरा शोषक समाज इन्हें इन संस्थाओं से बाहर निकालने का प्रयास करता है। 
  वंचित समाज तो आज तक यह  भी नहीं समझ पाता की प्रोफेसर होता क्या है उन्हें लगता है डिग्री कॉलेज में पढ़ाने  वाला हर व्यक्ति प्रोफेसर है लेकिन उनकों क्या पता पहले आप गेस्ट बनते हैं, कॉन्ट्रैक्ट पर रखे जाते हैं, असिस्टेंट बनते हैं फिर एसोसिएट होते हैं उसके बाद प्रोफेसर वह भी इस बात पर तय होता है कि आपका  जीवन और सत्ता के साथ सब कुछ ठीक है ।  आज जब किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर और प्रोफेसर की भर्ती निकलती है तब उस पर नेता और राजनेता गिद्ध की तरह नजर रखते हैं अपने लोगों को  सेट करने के लिए ,ऐसी स्थिति में एक दलित जिसकी थाने में अपनी एफ आई आर लिखवाने तक की भी हैसियत नहीं वह भला इतना बड़ा रसूख कहां से पैदा करेगा? दलितों को यहां तक पहुंचने से रोकने के लिए एन एफ एस उसकी सबसे आखिरी कड़ी होती है जिसके जरिए  यह लोग बताने का प्रयास करते हैं कि आपके समाज के लोग अभी प्रोफेसर बनने के योग्य नहीं है और संवैधानिक रूप से घोषित पद को यह लगातार एनएफएस  घोषित करके उसे सवर्ण जाति में तब्दील करके अपने लोगों को घुसा देते हैं । आज देश के 45 केन्द्रीय विश्वविद्यालय में मात्र 96 दलित प्रोफ़ेसर है यानि एक विश्वविद्यालय में लगभग दो यही स्थिति कालेजों की भी है यहाँ कुलपति बनना तो किसी क्रांति से कम नहीं है । देश के आईआईटी जैसे संस्थानों में इनकी संख्या शून्य है यह है एन एफ एस का खेल और यह खेल  एक सामान्य दलित तब तक नहीं समझ सकता जब तक वह इस भीड़ में शामिल नहीं होता यही कारण है की  उन्हें आसानी से हिन्दू वोट बनाने के लगातार प्रयास होते रहते और जो यहाँ तक पहुँच चूका है वह इनके इस वोट बैंक को समझाने का कार्य करता है जो इन्हें नागवार है  । एक विद्यार्थी इन्हीं के साथ स्नातक करता है स्नातकोत्तर करता है नेट पास करता है और पीएचडी भी पास करता है फिर एक योग्य हो जाता है और दूसरा अयोग्य यह  कौन सी शिक्षा है?मजे की बात यह है कि आपके आवेदन स्वीकार से लेकर आपके साक्षात्कार और परिणाम घोषित करने तक आपका कोई व्यक्ति यहां नहीं होता है  ऐसे में  आप भला इनसे न्याय की उम्मीद कैसे कर सकते हैं ?
    आज राहुल गांधी ने इस मुद्दे को छेड़कर दलितों को साहस देने का कार्य किया है वह भी यह स्पष्ट करते हुए कि यह मनुवाद का सबसे घिनौना रूप हैं ।  भारत उन्नत राष्ट्र  तभी बन पाएगा जब यहां का हर तबके का व्यक्ति शिक्षा, सत्ता, सम्पत्ति,मीडिया में समान स्थिति में पहुंचेगा इसके बगैर आप विकसित भारत की कोरी कल्पना करते रहिए ।

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