लोग क्या कहेंगे,इसी मानसिकता के इर्द गिर्द आधे भारतीय जीते हैं और अपनी पूरी जिंदगी बर्बाद कर लेते हैं। लोग याद रखेंगे,लोग तारीफ करेंगे,लोग मेरे दरवाजे पर बैठेंगे इत्यादि सोच के साथ ही हम भारतीय अपने जीवन की गाढ़ी कमाई उजुल फुजुल खर्च कर देते हैं,ये खर्च एक दिन करते हैं और सालों चुकाते रहते हैं। हमारे पड़ोस में ही एक किसान है उनके दो बेटे हैं दोनों ने भारतीय शिक्षा पद्धति के अंतर्गत न्यूनतम शिक्षा हासिल कर रखी हैं। दोनों की शादियां हो चुकी है शादी से लेकर के दोनों के दो पुत्र होने तक इन्होने समाज में हर प्रकार के खूब आयोजन किया, दिखावे के लिए इन लोगों ने अपनी कमाई से 4 गुना खर्च किया और यह सारा खर्च फाइनेंस कंपनियों से एक के बाद एक उठाते हुए किया. आज इनके पिता के पास जो जमीन थी जिससे इनका परिवार हंसी खुशी जीवन गुजारा करता था वह जमीन गिरवी है, अब यह दूसरों की खेती में मजदूरी करते हैं. उनके हालात देखकर के मुझे सवा शेर गेहूं की कहानी याद आती है. आखिर माइक्रो फाइनेंस कंपनियों से इनका कितना उद्धार हो रहा है? इस वर्ष मेरे तीन करीबी लोगों के बेटियों की शादी थी, सभी ने माइक्रो फाइनेंस कैंपनियों से लाखों कर्ज़ लेकर शादी में अपनी क्षमता से बढ़कर खर्च किया आज सभी महीने के पंद्रह से बीस हजार किस्त भर रहे हैं जब की सभी दिहाड़ी मजदूर हैं। इसके अतिरिक्त जो उन्होंने रिश्तेदारों से कर्ज़ लिए वो अलग हैं.भारत में दिहाड़ी मजदूरी कितनी हैं इससे आप सब वाकिफ हैं। परिणाम स्वरुप आज तीनों परिवारों के बच्चों को इस वर्ष अपनी शिक्षा रोकनी पड़ी हैं, गरीबों के घर के बच्चें जब शिक्षा छोड़ते हैं तब उन्हें फिर शिक्षा की तरफ मोड़ पाना बड़ा मुश्किल होता जो की गरीबों के जीवन परिवर्तन का आखिरी उम्मीद होती हैं। दूसरी तरफ इन परिवारों के ऐसे बच्चें जो अपने माँ बाप की मदद के लिए उनके काम में मदद करते हैं वे भी किशोरवस्था में मोबाइल अतिक्रमण का शिकार हो चुके होते हैं ऐसे में वे अपना शौख पूरा करने के लिए फाइनेंस कम्पनियों से मोबाइल फाइनेंस करवाते हैं जो वे इनके माँ के नाम से पास भी कर देते हैं और इस तरह एक गरीब बच्चा उस किस्त को चुकाने के लिए छोटी मोटी मजदूरी या दिहाड़ी करने लगता हैं। ऐसे में इन बच्चों को पुनः शिक्षा की तरफ लाना माँ बाप के लिए मुश्किल हो जाता है।आज लाखों अभिभावक इस समस्या से जूझ रहे हैं। कहने के लिए तों ये कम्पनिया महिलाओं को व्यवसाय के लिए कर्ज़ देती हैं पर आजादी के बाद से भारत सरकार भी ये कार्य कर रहा हैं और 90 के दशक ये कम्पनिया भी फिर आखिर गावों से हर दिन सैकड़ो के झूंड में जो लोग मजदूरी करने जाते हैं आखिर ये लोग कौन हैं?और दिल्ली मुंबई की ट्रेनों में ठूस ठूस कर फैक्ट्रिओं में कमाने वाले कौन हैं? आज देश में सैकड़ो फाइनेंस कंपनिया महिलाओं को कर्ज़ बाँट रही हैं और इनका रिकवरी दर 98% हैं जबकि सरकारी बैंके उलटे कर्ज़ में हैं ऐसा क्यों? दरअसल ये कम्पनिया लोगों को हर तरह का कर्ज़ देते हैं।एक आदमी को जो जरूरते हैं वह सब ये किस्त पर बाँटती हैं जैसे टीवी, कूलर, मोबइल, बाइक, गैस सिलिंडर इत्यादि और साप्ताहिक कर्ज़ादारों के घर जाकर वसूलती हैं यदि किसी दिन कर्ज़दार समय पर अपनी किस्त देने में अक्षम होता हैं उस दिन इनके वसूलीकर्ता कर्ज़ादारों के घर पर डेरा डाल देता हैं अंततः मारे शर्म के कर्ज़दार एक कर्ज़ चुकाने के लिए अपने गहने, बर्तन गिरवी रखकर अपना किस्त भरता हैं। देखते हो देखते पूरा परिवार मजदूरी कि गिरफ्त में आ जाता हैं।
ऐसी स्थिति में कुछ लोग अपना घर छोड़ देते हैं या फिर आत्महत्या कर लेते हैं। दरअसल फाइनेंस कम्पनियों ने साहूकारी से निजात दिलाने के लिए यह व्यवस्था शुरू की थी परन्तु आज मैं देख रहा हूं कि यदि साहूकारी जहर था तों यह मीठा जहर बन चूका हैं। हमारी सरकार बाजार और खरीददारी देखकर देश के विकास का आकलन करती हैं। आज 300 की दिहाड़ी करने वाला अपनी बेटी की शादी में पांच लाख खर्च कर रहा हैं, उसके घर में स्मार्ट फोन हैं, डिजिटल टीवी हैं, वह बाइक से मजदूरी करने जा रहा हैं। दिवाली, होली, नवरात्र धूम से मना रहा हैं पर पांच किलो राशन न मिले तो शायद उन्हें भूखा रहना पड़े, सरकारी आवास न मिले तो वे बेघर हो जाए आखिर यह कैसा विकास हैं? दहेज़ एक बड़ी चुनौती हैं हमारे देश में पूर्वी भारत के ज्यादातर गरीब इसी दल दल में फंसे हुए हैं। आज एक पिता को अपनी बेटी व्याहने के लिए कम से कम एक बाइक कि व्यवस्था करनी पडती हैं जिसे इस समाज में एक साधारण बात मान कर स्वीकार कर लिया गया हैं। मैं दावे के साथ कहता हूं कामगार परिवारों में 80% बाइक दहेज़ कि हैं। जाहिर हैं जब एक व्यक्ति बेटी को बाइक देगा तब बेटे की शादी भी बिना बाइक के नही करेगा फिर टीवी, अलमारी, फ्रिज जो कभी वह अपनी कमाई से नही खरीद सकता वह अपनी जरूरते ऐसे हो पूरा करता हैं जिसके लिए बाजार हर प्रकार से तैयार खड़ा हैं.दरअसल पूरा बाजार, पूरी सरकार इनके दम पर खड़ा हैं ये सिर्फ इनके के लिए भीड़ मात्र हैं। इनकी जिंदगी किस्तों में बट चूकि हैं। एक तरफ सरकार इन्हें राशन की लाइन में खड़ी कर रही हैं दूसरे तरफ व्यापारी इनके दरवाजे पर किस्तों के लिए खड़े हैं, शिक्षा और विकास का दरवाजा इनके लिए बंद हो रहा हैं। आजादी पश्चात् से लेकर 2013 तक भारत पर 55 लाख करोड़ कर्ज़ थे 2013 से 2024 तक यह कर्ज़ 155 लाख करोड़ में तब्दील हो चूका हैं, भूख की वैश्विक सूची में हम अपने पडोसी देशों से भी निचे हैं तो वास्तविक विकास ये हैं और ये तब हैं जब देश की सम्पत्ति बेचीं जा रही हैं, एक परिवार का हर वह सदस्य जो किशोरवस्था से ऊपर हैं किसी न किसी प्रकार की मजदूरी से जुड़ा हुआ हैं। बाज़ारीकारण ने निम्न वर्ग के लोगों की सोचने समझने की शक्ति छीन ली हैं। शायद ऐसी हो परिस्थितियों के लिए टालस्टाय ने कहा हैं कि "हम सब कुछ करने को तैयार हैं सिवाय गरीबों के पीठ से उतरने के'।
डॉ संजीव कुमार