आंबेडकर बगैर भारत


सुख और सुख शासन सब पर शासन यही   मनुष्य के व्यवहार में है इसलिए वह हर वक्त प्रयत्न करता है और आजीवन करता रहता है । दलितों ने तो  कभी सत्ता सुख देखा ही नहीं इसलिए वह इसकी कल्पना भी करने से डरते हैं। पर जिसे कभी यह मिला ही ना हो और आसानी से मिल जाए तो फिर क्या होगा ?वह उसकी कदर कर पाएगा और कब तक कर पाएगा ?और फिर क्या उसका विस्तार कर पाएगा? इसका जवाब मैं आप पर छोड़ता हूं।
 भारत के असंख्य दलित ,आदिवासी, पिछड़े,अल्पसंख्यक वंचित जातियां और वह  समाज जिनका सदियों तक शोषण हुआ, हुई जो बिखरे हुए हैं मत से सहमत से क्या कभी सत्ता सुख के बारे में एक जुट होकर सोचते हैं?
आज सभी व्यक्तिगत नशे में है जो दलित कामयाब है उसे अपने ही लोग जाहिल नजर आते हैं ,जो अशिक्षित मजदूर हैं वह पढ़े लिखो की सुनने को तैयार नहीं क्योंकि वह अपने दैनिक मजदूरी में ही अपना भाग्य तलाश रहा है और उसे नियति मानकर बगावत से बचना चाहता है ।मुझे अशिक्षितों मजदूरों से ज्यादा शिकायत नहीं है मुझे शिकायत है पढ़े लिखे कामयाब दलितों से  जो अपने कामयाबी को सिर्फ अपना मानते हैं और विशेषता उन जातियों से जो कालांतर में अछूत घोषित किए गए थे जिनके समाज के लोग अभी भी उसकी सजा भोग रहे हैं ।क्या कभी इन कामयाब और तुक्ष लोगों ने अंबेडकर की पीड़ा संघर्ष और त्याग को समझा है? पिछले  75 वर्ष से हर 5 वर्ष में 131 दलित सांसद चुने आते आए हैं ,हर पंचवर्षीय चुनाव में विधानसभा के लिए 1065 दलित विधानसभा चुनकर पहुंचते हैं आखिरी इन लोगों ने अपने समाज के लिए क्या किया? 75 साल से लगभग हर वर्ष 100 से ज्यादा आईएएस एवं आईपीएस बनते हैं आखिरी ये अपने समाज के लिए क्या कर रहे हैं? इसके अतिरिक्त अनेक प्रोफेसर ,अध्यापक, दरोगा, जज तमाम ऐसे प्रतिष्ठित पदों पर पहुंचने वाले लोग हैं जो सालों से वहां बैठते आ रहे हैं आखिर वह लोग अपने समाज के लिए क्या कर रहे हैं ?
 मेरी मुलाकात एक दलित जज से हुई वे एक सभा में दलित  स्थिति पर अपने विचार और पीड़ा व्यक्त कर रहे थे मैंने उनसे   दलित युवकों को अपने अनुभव और कुछ पैसों की मदद करने की बात कही । मैने कहा कम से कम आप  पांच युवकों को मदद करें ।ऐसा मैंने उन्हें सलाह दिया  इतने पर उनका कहना था कि अप दीपो भव अर्थात अपना संघर्ष करिए उनका कहना था लोगों को स्वयं संघर्ष करना चाहिए जबकि सच्चाई यह थी कि उनकी शिक्षा उनके ननिहाल में  पूरी हुई थी वरना वे  भी एक साधारण मजदूर होते। ऐसा मैंने इसलिए कहा क्योंकि उनका सगा भाई दिहाड़ी मजदूर है ऐसे महापुरुष आपको दलित समाज में बौद्धिक और संघर्ष गाथा कहते हुए अक्सर मिल जाएंगे ऐसे लोगों से समाज को बहुत ही ज्यादा खतरा है और ऐसे ही लोग दलित समाज के सचमुच असली दुश्मन है।
  कभी आप कल्पना करके देखिए अगर भारत में अंबेडकर का जन्म नहीं हुआ होता तो आप क्या होते ? आपके समाज की कैसे दुर्दशा होती ?कुछ लोग इसकी जगह यह कह सकते हैं कि फिर भी कोई न कोई जरूर होता  ।परआप दुनिया का इतिहास पलट कर देखिए सबसे पहले अमेरिका में लोकतंत्र की नींव पड़ी पर आपको पता  होना चाहिए कि वहां संविधान लागू होने के बावजूद काले लोगों को कोई विशेष अधिकार प्राप्त नहीं था। वहां की  स्त्रियों को आरंभ में मतदान का अधिकार नहीं था। रूस हमेशा से तानाशाही देश रहा है चीन के लोकतंत्रका मैं वंचितों शोषितों के लिए कोई विशेष अधिकार आज भी नही है। अरब देशों का लोकतंत्र तो आप जानते ही हैं।
 आज आपको जो अधिकार प्राप्त है वह इतना आसान नहीं था। उस समय हमारा देश जातीय संकीर्णता से बजबजा रहा था । आपको लगता है इतना आसान था वह सारा अधिकार जिसका सुख आप लोग भोग रहे हैं और सीना तान सोच रहे हैं कि यह सब आपकी योग्यता से मिला है बिल्कुल नहीं?
अंबेडकर कोलंबिया जाने से पहले यह समझ चुके थे कि किस तरह उन्हें अपने समाज की लड़ाई लड़नी है और इस लड़ाई में उनकी पत्नी रमाबाई जी ने वह सारा त्याग किया जो एक मां अपने पुत्रों के लिए करती है ।सचमुच वह दलित समाज की मां थी जिन्होंने अपने पुत्रों के बलि देकर हमारे हितों की रक्षा की है। जब बाबा साहब विदेश में पढ़ाई कर रहे थे तो अपने बड़े पुत्र की मृत्यु की भी  खबर उन्होंने उन्हें नहीं दिया था। बाबा साहब ने अपनी पत्नी की पीड़ा ,पुत्र शोक, समाज का तिरस्कार ,लोगों का अपमान सब कुछ सहा और शिक्षा को ही अपनी ताकत बनाएं क्या सिर्फ उन्होंने यह सब अपने लिए किया।
गोलमेज सम्मेलन का इतिहास शायद आप भूल चुके हो पर वहां तक पहुंचना  इतना आसान नहीं था। इसके लिए उन्होंने लंबी योजना बनाकर वर्तमान सरकार और विश्व में अपनी एक छवि तैयार की। क्योंकि गोमेज काम है भविष्य पता था।  इसलिए वहां पहुंचने के लिए उन्होंने बहुत ही प्रयास किया। यह वह दौर  था जब दलितों की परछाई भी समाज स्वीकार नहीं कर रहा था। पर उन्हें इसका जवाब ढूंढना था और इसका जवाब था ढेर सारा ज्ञान ।ज्ञान इतिहास का संस्कृत का वेद पुराण का अर्थशास्त्र का भूगोल का राजनीति का भाषा विज्ञान और कानून का। उन्होंने सबके विषय में उच्च ज्ञान अर्जित किया   ताकि सब का मुंह तोड़ जवाब दे सके।इस तरह गोलमेज सम्मेलन तथा संविधान पीठ में उन्होंने  इसका भरपूर प्रयोग किया जिससे की सभी के धरे के धरे ज्ञान और अहंकार को चकनाचूर  हो सके ।और फिर आपके लिए वह सारे अधिकार बनाए जो मनुष्य होने के लिए, आपको समान अवसर देने  के सभी दरवाजे खोलने के लिए जरूरी थे।
 उन्होंने अपने जीवन में 50000 से ज्यादा पुस्तक पढ़ी ।दर्जनों  डिग्रीयां  हासिल की जिसे प्राप्त  करने के लिए मनुष्य का एक जीवन कम पड़ जाएगा। अपनी बीमारियों से ग्रसित होते हुए भी अपने पुत्रों को बलि देते हुए भी अपनी स्वयं का सुख का त्याग करते हुए भी उन्होंने ऐसा किया आखिर क्यों सिर्फ अपने लिए,?
   तो अब जब तुम जवानी में पागल होकर पढ़ाई छोड़ते हो तो अंबेडकर को पढ़ लेना ,जब तुम कामयाब  होना तो अपने पैसे अपने कामयाबी को सिर्फ अपना मत समझना, जब नेता और मंत्री बनना तो किसी और के आगे सर झुकाने से पहले सोचना कि सर कहां झुकाना है। और अपना बंगला बनाने से पहले आसपास भी यह देख लेना कि तुम्हारे अपने लोगों के पास रहने के लिए घर है या नहीं। और फिर भी भूलने की आदत जो तुम्हारी ना जाए तो  अपना समय और पैसा उड़ाने से पहले किसी पार्टी में जब तुम निकलते हो तो पार्टी में निकलने से पहले अपने आप को आईने के सामने ले जाना और उसे आईने के पीछे अंबेडकर की फोटो लगाए रखना ताकि अपनी शक्ल के साथ अंबेडकर को भी देखना शायद तुम्हारा जमीन तुम्हें काबिल होने के पागलपन से बाहर निकाल सके।

डॉ.संजीव कुमार 

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