मायावती की लचर राजनीति और निराश दलित

भारतीय इतिहास में मायावती जी की राजनीति हमेशा से स्वर्णिम अक्षरों में लिखी जाएगी। कांसीराम की छवि से निखरकर निकली मायावती की कद्दावर छवि कभी भी भारतीय राजनीति में भुलाई नहीं जा सकती। भारत जैसे देश में जहां हजारों सालों से दलितों ,शोषितों को सिर्फ सेवा और झाड़ू लगाने तक ही सीमित रखा जाता था उसे देश में और वह भी एक ऐसे राज्य में जहां जाति हिंसा की घटनाएं देशभर में सबसे ज्यादा होती है एक ऐसा राज्य जहां जाति विशेष पर सबसे ज्यादा बातें होती हैं। ऐसे राज्य में वह भी एक महिला होते हुए चार बार मुख्यमंत्री के पद पर बैठना एक विशाल इतिहास लेखन के लिए काफी है।
   वे जब-जब सत्ता पर बैठी तब तब सत्ता की अनूठी मिसाल पेश की उनके न्यायिक प्रक्रिया को पूरी दुनिया लोहा मानती थी। परंतु 2017 के बाद से उनकी राजनीति प्रतिवर्ष रसातल में डूबती जा रही है। डॉ अंबेडकर कांशीराम के बाद कोई दलित राजनीति में लंबी पहचान बन सका तो आप मात्र मायावती ही है । देश का दलित समाज आज भी उनकी तरफ आशा की नजर से देखता है। वह सोच रहा है कभी न कभी तो फिर मायावती वह तिलिस्म खड़ा कर ही देंगी जिसके लिए वह जानी जाती है। पर अब ऐसा कुछ दिखाई नहीं देने वाला। दरअसल आज की राजनीति विज्ञापन प्रचार प्रसार और दिखावे पर है। आप जितना बड़ा झूठ बोल सकते हैं ,आप जितना सड़कों पर दौड़ सकते हैं ,आप जितना गलियों में हुंकार भर सकते हैं उतने ही चर्चित नेता बनेंगे। विवादित बयान दीजिए, और खूब झूठ बोलिए। सत्ता में उछल कूद की भी बारीकियां को भी समझिए। परंतु मायावती और उनके जैसे नेताओं में इन सब चीजों का बहुत ही अभाव है। और वास्तविक राजनीति आज का है भी यही । मायावती उस समाज का प्रतिनिधित्व करती है जो सड़कों पर है, बजबजाती गलियों में है, धर्म और धर्म के बीच उलझा हुआ है, शिक्षा की प्रथम दहलीज पर खड़ा हुआ है, जिन्हें कोई भी लॉलीपॉप दिखा कर अपनी तरफ खींच लेता है अपनी तरफ समेट लेता है। इस समाज ने पूरी तरह से अपने आप को उनके कंधों पर रख दिया था पर वे लगातार चूंक पर चूंक करती जा रही है।
   पिछले एक दशक से देश भर में दलितों पर कई अत्याचार हुए उनके कई तरह के हक छीन गए। परंतु मायावती कोई ठोस पहल नहीं कर सकी ।एक अच्छा राजनेता सिर्फ सत्ता में बैठकर ही अपने लोगों की सेवा नही करता बल्कि बगैर सत्ता के भी वह उनकी हिफाजत कर सकता है । मान्यवर कांसी राम जी ने भी यही कहा था कि हम सत्ता में रहे या ना रहे परंतु सत्ता को अपने लिए निर्णय लेने पर विवस करने की क्षमता हमें होनी चाहिए। आज भारतीय जनता पार्टी लगातार चुनाव जीत रही है तो वह इसलिए नहीं कि वह समाज के लिए बहुत अच्छा कर रही है परंतु वह इसलिए जीत रही है कि वह समाज में चारों तरफ फैली हुई है। यह सत्ता में रहते हुए भी पहचान है और मायावती बगैर सत्ता के भी चैन से बैठी हुई है । वह यह क्यों भूल जाती हैं कि वह गरीबों वंचितों की नेता है उनका काम है कि वह लगातार सड़कों में, गलियों में आंदोलन करें अपने लोगों के लिए सरकार से लड़े, धरना दें , अपने आलीशान बंगले से बाहर निकले और अपने मुट्ठी भर ईमानदार नेताओं के साथ जनआंदोलन खड़ा करें। दलित समाज में उनके प्रति दीवानगी अब भी बची हुई है। दूसरी पार्टियों अपने रैलियों के लिए भारी भरकम पैसा खर्च करती है तब कहीं जाकर भीड़ इकट्ठा होती है ।परंतु जन आंदोलन के लिए सड़कों पर जिस दिन वह उतर जाएंगी देश में उनसे बड़ा कोई नेता नहीं दिखेगा। आज दलित समाज बिखरा हुआ है निराशा है ऐसे वक्त में उन्हें मायावती की एक हुंकार खड़ा कर देगी ।
डॉ.संजीव कुमार 

Post a Comment

Previous Post Next Post