वक्फ बोर्ड बनाम मठ बोर्ड

  वक़्फ़ बोर्ड का संशोधन कर अब इसे 'उम्मीद' करने की कवायद शुरू हो चुकी है। संशोधित बिल सरकार बहुमत के साथ  पारित करने के लिए विधेयक ला चुकी है और और इसके लिए बहुमत भी हासिल कर लिया है।हर बार की तरह विपक्ष इस मुद्दे को भी सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने की बात कर रहा है, पर सच्चाई सबको पता है कि क्या होने वाला है। आज मुस्लिम हर कदम पर ठगा जा रहा है, उसके अधिकारों के साथ सरकार हर पल खेल रही है।  मुसलमानों के दम पर राजनीति करने वाले और खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले नेता भी लगातार उनके साथ धोखेबाजी करते आ रहे हैं। बाबरी मस्जिद के फैसले को शांति से स्वीकार करने वाले मुसलमानो कों आज अपनी हर मस्जिद बचाने के लिए लड़ना पड़ रहा है। सरकार हर पल उनके स्वाभिमान से खेल रही है, उसे धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्द अच्छे नहीं लगते। मुसलमान के नाम पर राजनीति  करते-करते यह लोग बुद्ध और ईसाई मिशनरियों पर भी हमला कर रहे हैं। बोधगया पर इनका अतिक्रमण अब हमारे सामने है। भारत का पढ़ा लिखा कौम और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करने वाले नेता यदि आज खामोश रहे तो दलितों, वंचितों, अल्पसंख्यकों के भीतर के आग को दबाना मुश्किल हो जाएगा। 
   मुसलमानों का दोष यह है कि उन्होंने वक़्फ़ बोर्ड बनाकर अपने समुदाय द्वारा दान की गई संपत्तियों का हिसाब किताब  अपने समाज के हित के लिए सुरक्षित रखा।सरकार कों आज उनकी  9.4 लाख एकड़ (2022 के अनुमान के अनुसार)जमीन और 1.2 लाख करोड़ कि सम्पत्ति दिखाई दें रही है । सरकार चाहती है कि इन जमीनों का इस्तेमाल धार्मिक कार्यों के अलावा किसी और कार्य में भी लगाया जाए। वह अभी मुसलमानों को लालच दे रही है कि इस जमीन का प्रयोग वह उन मुसलमानों के लिए करेगी जिनके पास रहने की सुविधा नहीं है, उनके लिए जरुरी कार्यों के संबंध में इनका प्रयोग किया जाएगा। इसकी देखरेख के लिए जो वह उम्मीद कमेटी बना रहे हैं उसमें वें दो हिंदू भी रखना चाहते हैं।लोकतान्त्रिक नजरिए से देखा जाए तो यह ठीक है लेकिन सिर्फ वक्फ़ बोर्ड में ही क्यों ,क्यों न सभी धार्मिक कमेटियों में सभी धर्मों के लोगों को स्थान मिले । और बेहतर होगा सरकार बड़ा ह्रदय दिखाते हुए सबसे पहले हिन्दू धर्म की कमेटियों से इसकी शुरुआत करें।लेकिन मै दावे से कहता हूँ ये ऐसा कभी नहीं करेंगे क्योंकि जिस धर्म ने अपने धर्म के लोगों का ही हमेशा शोषण किया है वह इतनी ईमानदार कभी नहीं हो सकती ।
          अब सवाल यह है कि 30 करोड मुसलमानों के पास यदि इतनी जमीन है तो तकरीबन 100 करोड़ हिंदुओं के पास कितनी जमीन होगी? देश भर में 6 से 20 लाख तक हिंदुओं के मंदिर है।  जिनके पास 30-50 लाख एकड़ जमीन है(मोटा अनुमान, तमिलनाडु जैसे राज्यों के औसत और बड़े मंदिरों के डेटा के आधार पर) 3-8 लाख करोड़ रुपये (सोना, गहने, जमीन, और नकदी )। हिंदू मंदिरों को सदियों से राजाओं, जमींदारों, और भक्तों द्वारा विशाल दान मिलता रहा है। उदाहरण के लिए, तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर, कोणार्क सूर्य मंदिर, और खजुराहो के मंदिरों के पास अपने समय में हजारों एकड़ जमीन थी। इनमें से बहुत सी जमीन आज भी मंदिरों के नाम पर है, हालाँकि कुछ पर अतिक्रमण या सरकारी कब्जा हो चुका है।वक़्फ़ की परंपरा भी पुरानी है, लेकिन यह मुख्य रूप से मध्यकालीन और औपनिवेशिक काल में फली-फूली, जो हिंदू मंदिरों की तुलना में अपेक्षाकृत नई है।मंदिरों में सोने, चाँदी, और गहनों का भंडार वक़्फ़ की तुलना में कहीं ज्यादा है। तिरुपति (11 टन सोना), पद्मनाभस्वामी (20 टन से अधिक), और जगन्नाथ (5-10 टन) जैसे मंदिरों का खजाना ही अकेले वक़्फ़ की कुल संपत्ति के मूल्य को पार कर सकता है।मठों (जैसे शंकराचार्य मठ, रामकृष्ण मिशन), आश्रमों, और धर्मार्थ ट्रस्टों को भी शामिल किया जाए, तो संपत्ति का आँकड़ा और बढ़ेगा। उदाहरण के लिए, कांची कामकोटि पीठ और श्रृंगेरी मठ के पास सैकड़ों एकड़ जमीन और संपत्तियाँ हैं।
      वर्तमान सरकार हमेशा हिंदू राष्ट्र की बात करती है। हिंदुओं के हित की बात करती है। अगर वह सचमुच में हिंदुओं की हितैसी है तो उसे  भी वक़्फ़ बोर्ड की तरह जिसे अब वह उम्मीद करने जा रही है देश के सभी हिंदू धर्म के ट्रस्ट, मठ आश्रम,बड़े मंदिरों के संपत्ति का हिसाब रखने के लिए उनका देखभाल करने  के लिए भी हिंदू मठ बोर्ड जैसा एक कमेटी बनाने की आवश्यकता है। इस दिशा में आप नेता संजय सिंह भी  संसद में बोल चुके हैं, उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल करते हुए कहा कि अगर वह सचमुच में भारत के जनता की रक्षा की बात करता है, उसे सबके हितों की चिंता है तो क्यों नहीं वह भी  हिंदू मठ कमेटी की स्थापना कर रही है, इस मठ में 80% दलितों, आदिवासियों,और पिछड़ो  को रखा जाए और उनके देखरेख में सारी संपत्ति का हिसाब किताब रहे। हम जानते हैं आज किसी भी धर्म में दान की हुई संपत्तियों का  उसके उच्च अधिकारी, उसके मठाधीश किस तरह इनका बंडल बाट करते हैं। इन संपत्तियों को लेकर आए दिन मठों में झगड़ों , विवाद तथा रक्तरंजिश होते रहते हैं।
  आज सरकार बेरोजगारी, रुपए में गिरावट, भारी कर्ज से लदी हुई है जनता को विश्वास में रखने के लिए तथा बहकाने के लिए उसके पास कोई बहाना नहीं है। इसलिए वह लगातार मुसलमानों पर कभी बाबर तो कभी औरंगज़ेब, और कभी मस्जिद के नाम पर समाज में माहौल बिगाड़ने का काम करती रहती है। आज हर समाज के गुजारा करने के लिए जमीनों की कमी है। इंच इंच जमीन के लिए आज भी गांव में कत्ल होते रहते हैं। ऐसी हालत में सरकार को लगता है कि वक्त बोर्ड से प्राप्त हुई जमीनों से इसका कुछ समाधान निकाला जा सकता है। वक़्फ़ बोर्ड में यह तो सहूलियत है कि  उसमें इस्लाम के  मानने वाले अनेक जातियां उसका हिस्सा है, पर हिंदू मठों कि संपत्तियों पर तो  सदैव से एक ही जाति का पितृसत्तात्मक साशन है। अगर उसकी मनसा वाकई ऐसी है तो उसे अपने  90% उपेक्षित, शोषित,दबे कुचले दलितों, पिछड़ों के लिए अपने मठों और मंदिरों के संपत्तियों का द्वार  खोल देना चाहिए ।


डॉ.संजीव कुमार
राजनीतिक विशेषज्ञ 

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