भारत में जाति समस्या और उसका समाधान

जाति ऐसे जाएगी
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   वर्ण व्यवस्था की समस्या भारत देश की सबसे बड़ी समस्या में से एक है। जातियों के विषय पर हम जानते हैं सबसे ज्यादा अध्ययन डॉक्टर अंबेडकर ने किया है और उन्होंने ही इस समस्या से लड़ने की सबसे महत्वपूर्ण उपाय सुझाए हैं। अतः इस विषय पर उनसे ज्यादा किसी और की समझ नहीं है यह सर्वविदित हो चुका है।
डॉक्टर अंबेडकर ने भारत की जाति व्यवस्था की सड़ांध पर कहा था की एक गुलाम आजाद हो सकता है वह अपनी गुलामी से मुक्ति प्राप्त कर सकता है परंतु भारत की जो जाति व्यवस्था के कारण जिस समाज को हमने अछूत घोषित कर रखा है वह अपने इस आजीवन इस पीड़ा से कभी भी मुक्ति नहीं पा सकता क्योंकि गुलाम मेहनत करके परिश्रम करके अपनी गुलामी की जंजीरों को तोड़ सकता है वह धन एकत्रित करके मालिक बन सकता है परंतु अस्पृश्य धन इकट्ठा करने के बावजूद भी, शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद भी अस्पृश्य ही  रहता है। ऐसा इस देश के वर्ण व्यवस्था के संचालकों ने  उन्हें धरती के डूबने तक  के साथ तक की व्यवस्था कर रखी है।

आज हर 15 मिनट में किसी दलित व्यक्ति का शोषण होता है हर 30 मिनट में किसी दलित स्त्री का बलात्कार किया जा रहा है और हर दूसरे घंटे किसी दलित की हत्या की जा रही है परंतु यह समस्या जस की तस बनी हुई है.दर्जनों सरकारें आई और चली गई और सभी ने इनके न्याय की कसमें खाकर सरकारी बनाएं पर किसी ने इस समस्या का निवारण करने का साहस और विवेक नहीं दिखाया।

कैसे होगा इस समस्या का समाधान?

दुनिया में मानव से संबंधित जो भी समस्याएं हैं वे या तो प्राकृतिक है या फिर समय अनुसार रहे है । परंतु भारत में जो अस्पृश्यता की समस्या है वह एक लेबल की तरह है मसलन आप गोरे हो या काले हो आप भले ही अशिक्षित हो परंतु यहां बनाई गई वर्ण व्यवस्था में अगर आप तथाकथित उच्च कुल में पैदा होते हैं तो आप श्रेष्ठ ही माने जाएंगे वही एक अस्पृश्य व्यक्ति चाहे वह सुंदर हो सुशील हो शिक्षित हो पर वह अपनी जाति से नहीं भाग सकता उसके साथ समाज में वही व्यवहार किया जाएगा जो एक द्वार पर पाले गए कुत्ते के साथ किया जाता है। यह बात गोलमेज सम्मेलन में स्वयं अंबेडकर ने मालवीय जी के सामने कही थी कि हमारे देश में हमारे साथ कुत्ते बिल्लियों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है। डॉक्टर अंबेडकर ने इस समस्या से लड़ने के लिए हमें जो सबसे बड़ा हथियार दिया है वह शिक्षा है इसके अतिरिक्त और हमारे पास कोई साधन नहीं है यही एक आखरी उपाय है और आखरी उम्मीद। परंतु राजनीतिक रूप से भी हम इसका सामना जिस तरह कर सकते थे अभी तक वैसी नियत हमारे नेताओं में देखने को नहीं मिली है इसलिए यहां मैं कुछ सुझाव रख रहा हूं-

- राजनीतिक विज्ञापन का प्रयोग

हम भारतीय लोग कहानियों में और दृश्य में बड़ा विश्वास रखते हैं और इसका प्रभाव हमारे जेहन में बहुत तेजी से होता है इसके कई प्रमाण हैं जैसे रामायण की रचना और उसका दृष्यांकन। आजादी से लेकर के आज तक की सरकारों ने सत्ता बनाने के साथ-साथ देश की कई समस्याओं पर विज्ञापनों का भरपूर प्रयोग किया है और काफी सफलता भी हासिल की है परंतु कभी भी इसका प्रयोग अस्पृश्यता मिटाने के लिए नहीं किया जबकि इसका प्रयोग आज से 30_ 40 साल पहले ही हो जाना चाहिए था और मुझे पूरा यकीन है कि इससे भारतीय लोगों के जनमानस में बहुत ही ज्यादा प्रभाव देखने को मिलता ।
  सरकारों ने गरीबी हटाओ से लेकर हम दो हमारे दो के प्रचार प्रसार के लिए कंडोम का सरेआम प्रचार प्रसार किया और उसका प्रभाव हमें देखने को मिला कि जनसंख्या वृद्धि में हमने काफी काबू पाया वर्तमान सरकार ने भी स्वच्छ भारत अभियान और निर्मल गंगा जैसी अपनी नीतियों को लागू करने में विज्ञापनों पर अरबों रुपए उनके और हम देख सकते हैं कि वे काफी सफल भी रहे । तो क्या विज्ञापन के जरिए तरह-तरह के नाट्य रूपांतरण बनाकर टेलीविजन, रेडियो के जरिए हर घटे जब इस समस्या पर लोगों को कहानियां दिखाया जाएगा और उनकी अंतरात्मा को झकझोरा जाएगा तो क्या उन पर प्रभाव नहीं पड़ेगा मुझे लगता है बिल्कुल इसका प्रयोग होना चाहिए।

अंबेडकर की पूजा बंद करें
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आज देश में अंबेडकर के नाम पर राजनीति के करने के साथ-साथ उनकी पूजा का भी प्रथा बहुत ही तीव्रता से बढा है लोग बोलते हैं कि वे एक विद्वान समाजशास्त्रीय और राजनीतिज्ञ थे परंतु बहुत से पढ़े लिखे दलितों को भी मैं देख रहा हूं कि वह उनका पूजा और अनुष्ठान,शादियों घर निर्माण इत्यादि में कर रहे हैं जो कि नहीं होना चाहिए हां यह अलग बात है कि उनके मन में हिंदू धर्म के लिए अब सम्मान नहीं बचा है इसलिए उनके पास दूसरा कोई उपाय नहीं है परंतु अगर आप उन्हें भगवान बना देंगे तो आप सिर्फ उन्हें एक पत्थर ही बना रहे हैं याद रखिए जब भी किसी व्यक्ति की मूर्ति पत्थर में तब्दील हो जाती है तो उसके विचार भी दफन हो जाते हैं हमें उनके विचारों को समझना होगा गहनता से और अपने अनुष्ठानों के लिए किसी और को चुनना होगा।

राजनीतिक एकता
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22 प्रतिशत प्रतिशत दलित और आदिवासियों के आरक्षण के अनुसार उनके इतने प्रतिनिधित्व करने वाले विधायक और सांसद हर चुनाव में चुने जाते हैं परंतु वे विवश होकर अपने सुख के लिए अपने लोगों के लिए आवाज उठाना बंद कर देते हैं हमें ऐसे लोगों को चुनने से पहले बहुत विचार करना होगा और ऐसे लोगों का परित्याग करना होगा।
  हमें कुछ ऐसी रणनीति बनानी होगी कि जिससे ऐसे लोग ही चुनकर वहां पहुंचे जो सत्ता को विवश कर दें उनके हित की सोचने के लिए। सामाजिक रुप से दलितों को इतना सशक्त होना होगा कि अपने ऊपर हमले का बदला लेने के लिए उन्हें संविधान में भरोसा रखने के साथ-साथ स्वयं भी अपनी सुरक्षा कार व्यवस्था करना होगा और अब  उन्हें पलट कर जवाब देना सीख लेना चाहिए।

हिंदुत्व और ब्राम्हण का सीधा विरोध ना करें
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बहुत से अज्ञानी दलित और शिक्षित लोग बड़े धड़ल्ले से हिंदुत्व को गालियां देते फिरते हैं और स्वयं उनकी परंपराओं से बंधे हुए हैं उनकी घरों में वह सारे कर्मकांड होते हैं जो एक ब्राम्हण के घर में होते हैं पर फिर भी वे हिंदुत्व को गालियां देते हैं.अगर बदलाव लाना है तो अपने में बदलाव लाईए किसी की आस्था को ठेस नहीं लगाना चाहिए जैसे आपकी आस्था को कोई गाली देता है तो आपको तकलीफ होती है उसी तरह उनकी आस्थाओं को भी गाली मत दीजिए पूर्वाग्रह से बचिए यह समय पूर्वाग्रह का नहीं है। मत भूलिए की कई  ब्राह्मणों ने भी दलित समाज के लिए संघर्ष किया है। आप अपनी आस्था और विचारों को खुद इतना मजबूत बनाइए कि लोग आपकी तरफ आकर्षित होने लगे यह काम आप किसी को गाली दिए बिना ही कर सकते हैं।

अपनी मीडिया
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यह बात सत्य है कि आज मीडिया और वकालत में दलित समाज 1% भी नहीं अब हमें संघर्ष करना है यह हमें अभी कई दशकों तक करना होगा । दलित समाज के नाम पर आज कई मीडिया चैनल और पत्र समाज में खड़े हुए हैं परंतु उनमें वह क्षमता नहीं जो दलितों के अलावा पूरे समाज को अपनी तरफ आकर्षित कर सके. हमें यह रणनीति स्वयं मुख्य मीडिया से समझना चाहिए कि वे अपने लोगों की बातें बड़ी चतुराई से करते हुए हमें गालियां भी दे देते हैं बस यही हमें भी करना सीखना होगा। आज कानून सबसे बड़ी शक्ति है और इसी से हमें सुरक्षा मिलती है.जहां हमारे समाज के लोग बिल्कुल नहीं हैं हमें ज्यादा से ज्यादा अपने बच्चों को मीडिया और वकालत के क्षेत्रों में पहुंचाना होगा।
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डॉ.संजीव कुमार
राजनीतिक विशेषज्ञ 

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