हर साल बिहार राज्य में
दिवाली के छठे दिन छठ पूजा बड़े धूम धाम से मनाया जाता है |बिहार के लोगों के लिए
यह त्यौहार दिवाली और दशहरे से भी बड़ा है |मेरे साथ रहने वाले कई बिहार के लोग
कंपनियो से दिवाली की छुट्टी नही मांगते थे ,परन्तु छठ पर वे किसी के रोके नही
रुकते |

यह त्यौहार यू.पी.में मनाये जाने वाले
जीवित्पुत्रिका की तरह ही होता है परन्तु इसका आयोजन भव्य होता है |इस त्यौहार पर
महिलाएं 24 घंटे निर्जल व्रत रहती है और शाम को डूबते सूर्य की पूजा कर सुबह लौकी
भात सेवन के पश्चात् व्रत तोड़ती है | पूजा डूबते सूर्य की होती है और उसे छठी मैया
का नाम दिया जाता है |शास्त्रों में छठ जैसी किसी देवी का जिक्र नही है ,विल्कुल
संतोषी माँ की तरह –पर अब आपको कहानिया ढूढ़ कर सिखाया जा रहा है |इन सब के पीछे
बाज़ार का हाथ है |बाज़ार अर्थात हर वह व्यक्ति जिन्हें इससे असीमित लाभ मिलता है |
बाज़ार को व्यवसाय के लिए भीड़ चाहिए ,और हमारे
नेता को जितने के लिए |और हमारे देश में भीड़ धर्म के नाम पर इकठ्ठा कर सकते है या
फिर तमाशा के लिए |बाज़ार और नेता दोनों कामयाब है हमारी भीड़ का (भेड़ ) इस्तेमाल के
लिए|

दो
दशक पहले यह एक आम लोक त्यौहार था पर आज इसके लिए बिहार सरकार छुट्टी घोषित करती
है |लोग राष्ट्रीय छुट्टी की मांग कर रहे है |देश की धुरी दिल्ली के इंजिनियर
मुख्यमंत्री भी अपनी राज्य में राज्यकीय छुट्टी घोषित कर चुके है ,इसके साथ –साथ
वहां प्रति वर्ष 5 -10 करोड़ रूपये खर्च किए जा रहे है |बिहार के हर्ष और खर्च का
तो कोई हिसाब ही नही है |बिहार के किसी नागरिक से छठ पर्व के बारे मी पूछिए तो
इसकी महिमा मंडित में वह अपना सीना इतना चौड़ा कर लेता है जैसे यही उनका राष्ट्रिय
पर्व है ,और राष्ट्रीय पर्व पे वे भले ही आधे दिन की छुट्टी भी रखते हो |
विज्ञापन की भाषा में यह कहा जाता है कि
बार –बार बोलने से झूठ भी सच हो जाता है ,और जो दीखता है वो बिकता है |आज छठ एक
बड़ा व्यवसाय बन चूका है ,इस पर फ़िल्में बन रही है ,एल्बम बन रहे है ,बाज़ार सज रहे
है ,-भोजपुरी स्टार तो पुरे महीने भर इसपर कार्यक्रम कर के अपने फिल्मों से भी
ज्यादा वे इस दौरान विभिन्न कार्यक्रम कर के कमाते है |
और इन सब को शय दे रहे है हमारे देश के
अगुआ |वे संस्कृति के

नाम
पर हमारा पैसा पानी की तरह बहा रहे है |उन्हे रोजगार पर बात करने की फुर्सत नही है ,वे बिगड़ती शिक्षा पर सुधार
नही करना चाहते ,फेलोशिप –छात्रवृत्ति की लिए इनके पास धन नही होता ,सड़क खड्ढे है
,गरीब फूटपाथ पर सो रहा है ,कर्मचारियों क लिए वेतन नही है ,कम्पनिया डूब रही है
,जाति –धर्म के नाम पर क़त्ल हो रहे है ,पर हमारे नीति नियंता हर रोज एक नयी
संस्कृति को जन्म देने मे लगे हुए है |
इधर दो वर्षों से उ.प्र.सरकार भी अयोध्या में
लाखों दिए जलाकर प्रभु राम को हेलीकाप्टर से दर्शन कराने की एक नई संस्कृति को जन्म देने में लगी हुई है
|इस पुरे कार्यक्रम में मुख्यमंत्री जी
स्वयं हमारे चार –पांच करोड़ खर्च करके
घंटो कतार में खड़े रहेंगे |
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राजनेता यह अच्छी तरह जानते है कि समाज को यदि
जागरुक कर दिया गया तो हमारा पारंपरिक धंधा चौपट हो जायेगा |भला चीन को प्रभु राम
से क्या लेना उसे तो मुनाफा चाहिए |दिवाली के पडाके हम जलाते है और रौशनी उनके यहाँ होती है |
हमारे देश में सैकड़ो ऐसी संस्कृतिया थी जिसे
हमने त्याग कर दुनिया में
बैठने के काबिल हुए है |पर बहुत दिन हो गये इस
देश में जागरण लाने वाले बुद्धिजीवियों कोअवतार
लिए |लेकिन अब वक़्त आ चूका है की हम आगे आये और समाज को पीछे ले जाने वाले
,रूढ़ बनाने वाले ,फिजूलखर्च ,और गन्दी संस्कृति को सह देने वाली व्यापरियों को हम
अपने विकास माडल से बहार फेंक दें क्योकि कुछ दशकों से हमारे देश में कई गन्दी संस्कृतियों ने जन्म ले लिया है |
डॉ संजीव कुमार
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