एससी एसटी पर बढ़ते अपराध और चंद्रशेखर के सवाल
भीम आर्मी के संस्थापक और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा नगीना के सांसद चंद्रशेखर आजाद ने संसद के इस शीतकालीन सत्र में अनुसूचित जातियों और जनजातियों पर लगातार बढ़ते जा रहें अपराध पर चिंता जाहिर की हैं और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग पर तीखा हमला बोला है। उनके शब्दों में ये आयोग अब “संवैधानिक सजावट” मात्र रह गए हैं जो दलित-आदिवासी समाज के साथ होने वाले अत्याचारों पर खानापूर्ति करते हैं, लेकिन न्याय दिलाने में पूरी तरह असफल हैं।
अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 जिसे आज़ाद भारत में दलितों पर बढ़ते क्रूरतम अपराधों को देखते हुए इस अधिनियम की आवश्यकता महसूस हुई थी । संसद ने माना कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार के विभिन्न उपायों के बावजूद, वे असुरक्षित बने हुए हैं। उन्हें कई नागरिक अधिकारों से वंचित रखा जाता है; उन्हें विभिन्न अपराधों, अपमानों, अपमानों और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है । कई क्रूर घटनाओं में, उन्हें अपनी जान और संपत्ति से वंचित किया गया है। विभिन्न ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों से उनके विरुद्ध गंभीर अत्याचार किए जाते हैं।' जब देश आजाद हुआ तो इसकी सबसे ज्यादा खुशी अगर किसी को हुई थी तो वह थे गरीब,दलित, शोषित उन्हें लगा कि अब आजाद भारत में वें खुलकर सांस ले सकते हैं। एक सड़क पर चल सकते हैं, एक चौराहे पर बैठ सकते हैं, एक स्कूल में साथ पढ़ सकते हैं, एक कार्यालय में साथ नौकरी कर सकते हैं। अब किसी के आगे वेवजह सर झुकाने की जरूरत नहीं होगी। पर उन्हें क्या पता कि उनका सामना अब हजारों साल के मानसिक रोगियों से पड़ने वाला है । ऐसे मानसिक रोगी जो किसी विशेष जाति में जन्म लेने कारण एक मनुष्य होते हुए भी दूसरे मनुष्य को दोयम दर्जे का मानव समझते हैं। वे लोग कानून के इतने सक्षम होने के बावजूद भेदभाव करने से और उनके साथ पशुओं जैसा वर्ताव करने से बाज नही आने वाले .
वैसे तो भारतीय संविधान में अनुच्छेद 15 और 17 के अनुसार किसी भी तरह के भेदभाव का अंत कर दिया गया था। भारत के सभी नागरिकों को एक समान जीवन जीने का अधिकार प्रदान कर दिया गया था। परंतु फिर भी जब तमाम प्रावधानों के बावजूद दलितों का शोषण और दमन रुकने का नाम नहीं ले रहा था तब सरकार को एससी एसटी एक्ट बनाने की आवश्यकता पड़ी। आज शायद लोग भूल गए होंगे। परंतु इस एक्ट के पहले भारत में ऐसे दर्जनों दलित नरसंहार हुए थे जिसने उनके स्वतंत्रता के सभी सपनों को चकनाचूर कर दिया था(1968 तमिलनाडु के केल्विनमणि मैं 44 दलितों को कुछ मजदूरी बढ़ाने के मांग पर तथाकथित उच्च जातियों ने सबक सिखाते हुए जिंदा जला दिया था। इसके पश्चात् 1977 बेलछी नरसंहार, 1978 मराठीवाड़ा आंदोलन नरसंहार, 1981 देहुली नरसंहार,1984 करमचेडू नरसंहार, 1987 डालमऊ नरसंहार ) जैसे दर्जनों नरसंहार हुए जिसमें दर्जनों दलितों कों सबक सिखाने के नाम पर जिंदा जला दिया गया तो कहीं टुकड़े टुकड़े कर दिए गए।उनकी महिलाओ, लड़कियों का सरेआम बलात्कार किया गया, नंगा करके घुमाया गया। और यह सब आजाद मुल्क में किसी और ने नहीं बल्कि उनके ही मुल्क के लोगों ने किया था । फिल्म जगत में आज 'फाइल'बनाने की प्रक्रिया चल रही है। आज अगर इन घटनाओं पर फ़िल्में बने तो वे लोग जो
हिंदू राष्ट्र बनाने की बात कर रहे हैं, जो अंबेडकर को मिटाने की बात कर रहे हैं, जो उनके नाम पर सत्ता में बैठे हुए हैं शर्म से डूब कर मर जाएंगे।
30 जनवरी 1990 से लागू इस अधिनियम को अभी 25 वर्ष भी नहीं हुए हैं और इसे कई बार शिथिल करने और समाप्त करने का प्रयास हो चुका है। जबकि दलितों के साथ होने वाले ये बर्बर अत्याचार ना हिंदू राज्य में समाप्त हुए थे ना मुगल राज्य में न ही अंग्रेजो के शासन में और ना ही आजाद मुल्क में यह रुकने का नाम ले रहा है ।
राष्ट्रीय अपराध रिपोर्ट (Ncrb) के आकड़ो के अनुसार विगत दस वर्षो में ऐसे अत्याचारों में 56% की वृद्धि हुई हैं।एक तरफ तो सत्ता के लिए इन दलितों कों हिन्दू माना जाता हैं और मुस्लिमों के विरुद्ध एक होने की बात कही जाती हैं दूसरी तरफ उनके साथ आज भी पशुवत अपराध जारी हैं । विगत दस वर्षो में जब से देश कों हिन्दू राष्ट्र बनाने की राजनीति आरम्भ हुई हैं दलितों पर अत्याचार और बढ़े हैं।इनमें से कुछ चर्चित अपराधों ने देश और दुनियां कों अचंभित किया हैं। जिनमे ऊना कांड, रोहित वेमूला की आत्महत्या, हाथरस कांड, उन्नाव कांड, सिधी पेशाब कांड जैसे क्रूरतम अपराध शामिल हैं। और ये अपराधि जेल तक भी तभी पहुँचाए गए जब दलित पार्टियों ( जिनमे भीम आर्मी ने प्रमुख रूप से दबाव बनाने का कार्य किया हैं )और सामाजिक आंदोलनों का सरकार पर दबाव पड़ा। ऊना कांड पर प्रधानमंत्री जी घड़ियाली आशुँ बहाते नज़र आये थे तो सिधी कांड पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पीड़ित के पैर पखांरने जैसे नाटक किए थे जबकि यदि वें अपना काम ईमानदारी से करते तो इसकी उन्हें जरुरत नहीं होती । आज ऐसे अपराधों में सजा होने की स्थिति 20 % भी नही होती वह भी दशकों लग जाते है इन रसूखदार लोगों को सजा दिलवाने में . जिसके लिए इस परिवार को अपने रोजी –रोटी से समझौता तक करना पड़ता है ।एक ऐसा परिवार जो बमुश्किल से अपने लिए दो वक्त का भोजन जुटा पाता है उसके लिए समाज और कानून से न्याय पाने के लिए कितनी मुश्किल लड़ाई लड़नी पड़ती है ,सरकार को इसका अंदाज़ा नही है ।
चंद्रशेखर ने सरकार से सवाल पूछा की सरकार अस्पृश्यता, छुआछूत मानने वाले मानसिक रोगियों हेतु जनमाध्यमों का कैसे इस्तेमाल कर रही हैं और समाज पर इसका कितना प्रभाव हो रहा हैं? दरअसल बहुत कम लोग यह जानते होंगे की राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग कों जनमाध्यमों के जरिए भी समाज कों जागरूक करने हेतु धनराशि की व्यवस्था की जाती हैं । लेकिन सरकार गर्भ निरोध, एड्स, कैंसर, जैसे शारीरिक बीमारियों से निराकरण पर तो ढेरों विज्ञापन प्रसारित करना जानती हैं लेकिन हजारों साल से चले आ रहें छुआछूत, जातिगत भेदभाव जैसे मानसिक बीमारियों हेतु विज्ञापन करने से डरती हैं । मोदी जी सफाई अभियान तो चला सकते हैं लेकिन सफाई कर्म सम्मान अभियान नहीं चला सकते। सर पर मैला ढोना, खुले हाथों से मलमूत्र साफ करना ये सब अपराध भले ना हो पर करने वालों के लिए अभिशाप जरूर हैं ।
आज सरकार दलितों के मसीहा कहे जाने वाले बाबा साहब का देश भर में प्रतिमा लगवा रही है ।उनके सम्मान में बड़े – बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे है । लेकिन यह सब तभी सार्थक माना जाएगा जब ये अमानवीय अपराध रोकने में सरकार कामयाब हो पाएगी ।